श्रीमद भागवतम के चतुर्थ स्कन्द के १२वें अध्याय के २३वें श्लोक में वर्णन आता है, कि किस प्रकार महाराज ध्रुव अपनी पांच वर्ष की आयु में ही भगवत चेतना विकसित कर लेते है और न केवल भौतिक जगत में ३६ हजार वर्ष सुख भोग करते हैं अपितु उन्हें सबसे उच्च लोक आध्यात्मिक जगत में भी ध्रुव लोक भेज दिया जाता हैं। और ऐसा इसलिए होता हैं क्योंकि उन्होंने बचपन से ही भगवान् की भक्ति शुरू कर दी और उन्हें भगवान् नारायण के दर्शन भी प्राप्त होते हैं, उन्होंने अपनी इन्द्रियों और मन पर पूर्ण रूप से नियत्रण कर केवल भगवान् के नाम, रूप, गुण और लीलाओं पर अपना ध्यान केंद्रित किया जिससे उनके ह्रदय में स्थित परमात्मा ने उन्हें साक्षात् दर्शन दिए और उनका जीवन सफल बना। ध्रुव महाराज की तरह किसी भी पांच वर्ष के बालक को शिक्षित किया जा सकता है और कुछ ही काल में उसे कृष्ण चेतना का बोध हो सकता है और इस प्रकार वह अपना जीवन सफल बना सकता है। पर दुर्भाग्यवश ऐसी शिक्षा का विश्व भर में आभाव है, हमारे आधुनिक सामाज में बड़े - बड़े स्कूल और कालेज तो हैं पर किसी भी संसथान में बच्चों तथा युवको को भगवत चेतना का पाठ नहीं पढ़ाय...