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Showing posts from September, 2023

श्री श्री राधागिरिधारी ब्रह्मोत्सव

आज बहुत ही पावन दिवस है तिथि अनुसार आज के दिन ही श्री श्री राधा गिरिधारी, श्री श्री जगन्नाथ, बलदेव, सुभद्रा मैया एवं सुदर्शन, श्री श्री गौर - निताई एवं श्री श्री नरसिम्ह देव एवं प्रह्लाद महाराज को इस्कान मिरा रोड स्थित मंदिर में  विग्रह के रूप में स्थापित किया गया।  वर्ष २०१६ के श्रावण मॉस के शुक्ल पक्ष के वामन द्वादशी के शुभ दिन श्री श्री राधा गिरिधारी मंदिर का उद्घाटन किया गया।  इतिहास के रूप में देखने जाए तो श्री श्री राधा गिरिधारी स्वयं अपनी अद्भुत लीला से वहां प्रकट हुए और स्वयं विशाल मंदिर का निर्माण भक्तों के द्वारा करवाए। श्री श्री राधा गिरिधारी मंदिर की एक विशेषता यह भी है, कि जो भी भक्त सच्चे मन से उनसे प्रार्थना करता है उनकी वे सभी इच्छाएं पूरी कर देते हैं।  ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार हमारे मन में अरविन्द प्रभुजी और हम दोनों मिलकर कुछ समाज कल्याण का कार्य करना चाहते थे और इसके लिए हम सभी बहुत प्रयास रत रहते थे।  और एक दिन जब हमें अरविन्द प्रभू ने बताया की श्रीमान कमल लोचन प्रभुजी द्वारा जो की मंदिर के अध्यक्ष रूप में कार्यरत हैं श्री रामायण का प्रवचन क...

श्री श्री राधा अष्टमी - श्रीमती राधारानी का प्राकट्य दिवस

जब राधा और कृष्ण की बात आती है तब सांसारिक दृश्टिकोण से सभी के मन में एक ही प्रश्न उठता है, यदि राधा और कृष्ण प्रेम कर सकते हैं तो हम क्यों नहीं ? व्यावहारिक दृष्टि से हम सभी को यही लगता है कि जो प्रेम स्त्री और पुरुष इस संसार में करते हैं वही प्रेम राधा और कृष्ण ने किया, पर कभी हमने यह जानने की कोशिश नहीं करते कि इसके पीछे की वास्तविकता क्या है ? जिस सांसारिक स्त्री-पुरुष प्रेम के लिए हमारा समाज स्वयं विरोध करता आया है फिर चाहे वे लैला-मजनू या रोमियो- जूलिएट हो फिर कैसे वही समाज राधा - कृष्ण के इस अनैतिक प्रेम को इतना दिव्य मानेगा? वास्तव में इस संसार में वास्तविक प्रेम है ही नहीं, वो तो बस काम है जो स्त्री-पुरुष को एक-दूसरे को बाँध के रखता है।  वास्तविक प्रेम तो राधा और कृष्ण ने किया जिसकी महानता को हम आज भी स्वीकार करते हैं।  श्रीमती राधारानी कोई साधारण स्त्री नहीं है अपितु स्वयं भगवान श्री कृष्ण की आह्लादिनी शक्ति हैं और उनमें और कृष्ण में कोई अंतर् नहीं है, वे दो शरीर और एक प्राण हैं।  श्रीमती राधारानी के प्राकट्य का इतिहास अगर हम देखें तो सब कुछ स्पष्ट हो जायेगा कि ...

भावग्राही जनार्दन

 भगवान श्री कृष्ण वास्तव में भावग्राही हैं, यदि हम हृदय पूर्वक उन्हें श्रद्धा भाव से कुछ अर्पित करते हैं तो निश्चित रूप से वे उसे स्वीकार करते हैं फिर चाहे वह पत्ता, पुष्प, फल अथवा जल ही क्यों न हो।  श्रीमद भगवद्गीता में इसकी पुष्टि भगवान् श्री कृष्ण स्वयं करते हैं ९वे अध्याय के २६ वे श्लोक।  पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति। तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः।।९. २६।। इसके उदाहरण भी हमें शास्त्र में प्राप्त होते हैं, वास्तव में ये सभी वस्तुएं बहुत ही आसानी से और बिना मूल्य के सभी स्थानों पर उपलब्ध है और कोई भी इनको प्राप्त कर सकता हैं।  पत्ता - इस सन्दर्भ में हम देखे तो भगवान् की एक लीला जो द्वारका में रुक्मिणी देवी और सत्यभामा के बीच संपन्न हुयी थी, सत्यभामा ने भगवान् श्री कृष्ण के बराबर तुला दान करने का समझौता किया था पर सब कुछ एक सिरे पर रख देने के बाद भी तूले का दूसरा सिरा हिला तक नहीं।  फिर तुलसी का एक दल रखने मात्र से भगवान् का सिरा उठ गया।  पुष्प - श्रीमद भागवतम में गजेंद्र हांथी की कथा आती है, कैसे गजेंद्र और मगर का युद्ध हजार वर्षो त...