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घर में चार प्रकार के शत्रु कौन!

 गृहस्थ जीवन एक आश्रम हैं और यह सभी आश्रमों में श्रेष्ठ माना जाता हैं क्योंकि इस पर अन्य तीन आश्रम ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ और सन्यास निर्भर रहता है। पर यदि घर के सदस्य एक दूसरे से प्रेमपूर्वक न रहकर भगवान् को केंद्र में रखकर उनकी सेवा न करके अपनी - अपनी इन्द्रियतृप्ति में लगे हैं तब वह गृहस्थ नहीं गृहमेधि बन जाता है और उसका जीवन नर्क तुल्य हो जाता है।   आश्रम का अर्थ पवित्रता से हैं जहाँ हर व्यक्ति पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की सेवा में लगकर सुखी और सप्पन्न जीवन व्यतीत करते हैं पर यदि जिस घर में भगवान् और उनके भक्तों का सम्मान नहीं होता वहां हर व्यक्ति एक दूसरे से एक प्रकार के दुश्मन बने रहते हैं।  रावण के अनुसार ऐसे दुश्मन बाहर वालों से ज्यादा खतरनाक होते हैं, रावण विभीषण के लंका से चले जाने के बाद  कहता है, एक व्यक्ति को बाहर वालो से ज्यादा खतरा उसके घर वालो से रहता है। क्योंकि जब व्यक्ति स्वार्थी होता है तब वह किसी भी हद तक जा सकता है।  चाणक्य पंडित के अनुसार घर में चार प्रकार के शत्रु है।  १. अगर पिता कर्ज में है तो उसे दुश्मन माना जाता है - कहते हैं यद...