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दिवाली की हार्दिक शुभकामनाएँ

हमारा देश भारत सांस्कृतिक पर्वों का देश मना जाता है।  यहाँ पर न केवल विविध प्रकार के पर्व मनाये जाते है बल्कि उन पर्वों के पीछे कुछ न कुछ सामाजिक , पारम्परिक, सांसारिक, ऐतिहासिक और आध्यात्मिक कारण भी हैं।  पर आज शायद हम उन्हें जाने सुने बिना बस केवल एक प्रकार से अपनी इन्द्रियतृप्ति के लिए सभी त्योहारों को मना रहे हैं , जो न केवल समाज को गुमराह कर रहा हैं अपितु हमारी अपनी आस्था को भी ठेस पहुंचाता है।  बिना प्रमाणिकता के बस अपनी सनक वश किसी कार्य को करना यह केवल एक रजोगुण का प्रभाव है, और इस कारन व्यक्ति अपनी संस्कृति, धर्म और आस्था को एक तरफ रखकर केवल दिखावेबाजी में त्योहारों को मना रहा है।  आइये हम सभी दिवाली पर्व के इन सभी पहलुओं पर एक छोटी सी झलक डालते हैं जिससे हमने पता चले कि आखिर हम यह त्यौहार मनाते क्यों हैं ? पारम्परिक कारण : चूँकि हम सभी भारत भूमि में जन्म प्राप्त किये है इसलिए हमारा यह परम सौभाग्य है कि हमें बचपन से परम्परागत तरीके से इन सभी त्योहारों की छवि बचपन से मिलती आ रही हैं।  सामाजिक कारण : हमारी देश की बहुत ही अच्छी बात जो विविधता में एकता देखन...
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जय गुरुदेव -गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएं

गुरु शब्द संस्कृत के गु तथा रु की संधि है जिसका अर्थ है अंधकार से प्रकाश की ओर। गुरु हमें अंधकार अर्थात अज्ञानता से प्रकाश अर्थात ज्ञान के मार्ग पर ले आते हैं।  गुरु का एक और अर्थ होता है जिसका मतलब बहुत ही भारी, वास्तव में गुरु शब्द की सही- सही व्याख्या कर पाना बहुत दुर्लभ है। पर गुरु इतने दयालु एव्ं कृपालु होते हैं कि हम जैसे पतितो के उद्धार हेतु इस दुःख भरे संसार में आते हैं और हमें इस भव सागर से निकालकर अध्यात्मिक मार्ग पर ले कर आते हैं।  सही मायने में हम गुरु के ऋण से कभी भी मुक्त नही हो सकते हैं, पर यदि हम गुरु के बताए गए मार्ग पर दृढ़ता पूर्वक चलते हैं तो गुरु सदैव हमारे ऊपर अपनी कृपा बनाए रखते हैं।  गुरु वासत्व में भगवान् का प्रतिनिधि होते हैं, और उन्हे भगवान् से कम नही समझना चाहिए। शास्त्रों में तो यहाँ तक कहा गया है कि जो गाय को पशु, भगवान् के विग्रह को मूर्ति, और गुरु को साधारण व्यक्ति समझता है वह घोर नरक गामी होता है।  आइए हम सभी इस गुरु पूर्णिमा के शुभ अवसर पर अपने- अपने गुरुदेव के चरणों में प्रार्थना करें जिससे वे सदैव हमारा मार्गदर्शन करें और हमें तमोग...

महावीर हनुमान मंदीर प्राण प्रतिष्ठा समारोह

 हरे कृष्ण,  आप सभी को सूचित करते हुए अत्यंत हर्ष का अनुभव हो रहा है कि ग्राम पंचायत छातीडीह में अत्यंत प्राचीन महावीर मंदीर का जीर्णोद्धार एवं नवीन मूर्ति प्राण प्रतिष्ठा का भव्य कार्य वसंत पंचमी के पावन अवसर पर संपन्न हुआ।  यह मंदीर विगत 40 वर्षों से अधिक समय से जरजर अवस्था में थी, जिसमें विरलै ही कोई पूजा के लिए जाता था, लेकिन काफी समय बाद आज उस मंदीर की काया कल्प हो रही है।  इस कार्य में युवा पीढ़ी का योगदान अत्यंत महान है, आज कहीं न कहीं युवा पीढ़ी नशा, व्यभिचार, जुए और मांसाहार का शिकार होकर अपने आप को गर्त में गिराते हुए नास्तिकता की ओर बढ़ रहे हैं, पर इसी युग में इस प्रकार के अद्भुत एवं सराहनिय कार्य को होता हुआ देख सभी अचंभित हैं. आज ऐसे युवाओं की अत्यंत आवश्यकता है जो अपने धर्म और कर्तव्य के प्रति जागरूक हों, और इस कार्य में बड़ों के योगदान की भी अत्यंत आवश्यकता है,  क्योंकि भगवान भी भगवत गीता में कहते हैं, जैसे बड़े आचरण करते हैं वैसे ही छोटे भविष्य में करेंगे। यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।।3.21।। इस अद्भुत ...

गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएं !

प्रायः ऐसा कहा जाता है कि किसी भी क्षेत्र में यदि आपको कुछ सीखना है तो आपको गुरु रूप में किसी न किसी को स्वीकार करना होता है पर उनका स्तर भौतिक है, फिर यदि हम आध्यात्म की बात करें तो निश्चित रूप से हमें गुरु स्वीकार करना ही पड़ेगा।  क्योंकि बिना गुरु के हमें भौतिक ज्ञान तो एक बार कदाचित हो भी सकता है पर आध्यात्मिक ज्ञान बिलकुल संभव नहीं, इन्ही कारणों से हम देखते हैं की भगवान श्री राम एवं श्री कृष्ण ने भी गुरु को  स्वीकार किया।  इतना ही नही सृष्टि के निर्माता ब्रह्माजी को भी गुरु की आवश्यकता पड़ी श्रीमद भागवतम के दूसरे स्कन्द के दूसरे अध्याय के ३३ से ३६ श्लोक में जब ब्रह्माजी भगवान श्री कृष्ण द्वारा ज्ञान प्राप्त करते हैं तब जाकर कहीं वे सृष्टि का निर्माण कार्य करते हैं।  गुरु बनाना कोई फैशन की बात नहीं बल्कि उनके प्रति पूर्ण रूप से समपर्ण होना जरुरी है, क्योंकि गुरु कोई साधारण व्यक्ति नहीं अपितु स्वयं भगवान् श्री कृष्ण के प्रतिनिधि है और पतित जीवों का उद्धार करने जो की संसार के माया में पड़े होकर त्रिविध कष्टों को भोग रहे हैं उन्हें मुक्ति दिलाने आते हैं।  ॐ अज्ञान...

वैदिक जीवन शैली बनाम आधुनिक जीवन शैली - भाग २

 इसमें कोई  संदेह नहीं की अब हम वापस वैदिक जीवन शैली को शायद अपना पाए क्योंकि अब हम आध्यात्मिक और पारम्परिक भारतीय जीवन शैली से  इतने दूर आ चुके हैं की अब हमें इसे अपनाने में शर्मिंदगी महसूस होती है ।  अतः अब यह कहना बेकार है की हमें पुनः भारतीय परम्परागत जीवन शैली अपनाना चाहिए या सच कहा जाय तो शायद यह संभव भी न होगा, परन्तु एक बात तो हमें यह भी स्वीकारनी होगी कि आधुनिक जीवन शैली से भी हमारा किसी प्रकार से कल्याण नहीं होने वाला है।  तो क्यों न दोनों में परस्पर सामंजस्य बिठाया जाय और आधुनिक जीवन शैली बिताने के साथ  - साथ हम थोड़े आध्यात्मिक जीवन को भी अपनाये जिससे हम स्वयं अपने आप को और आने वाली पीढ़ी को पतन से बचा पाए। क्योंकि स्वयं भगवान् श्री कृष्ण इस बात की पुष्टि करते हैं, कि यदि कोई थोड़ा भी आध्यात्मिक (भक्तिमार्ग) को अपनाता है तो उसे बड़े से बड़े संकटो से रक्षा हो सकती है और इसमें हमारा कोई नुकसान भी नहीं ।  नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते । स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥ 2.40 ॥ इसीलिए भक्तिवेदांत स्वामी श्रील प्रभुपाद ने हमें केव...

महाशिवरात्रि की ढेर सारी हार्दिक शुभकामनाएं

महाशिवरात्रि की ढेर सारी हार्दिक शुभकामनाएं । श्रीमद् भागवत में शिव जी का वर्णन आता है किस प्रकार शिवजी एक महान वैश्णव के रूप में भगवान के निरंतर ध्यान में लगे रहते हैं।  वैसे तो शिवजी को आशुतोष के नाम से जाना जाता है जिसका अर्थ होता है शीघ्र ही प्रसन्न हो जाना ।  वास्तव में शिवजी सबसे प्रसन्न रहते हैं तभी तो वह भूत गण आदी को भी अपने शिष्य के रूप में स्वीकार करते हैं।  शिवजी अपने आचरण से हमें यह दिखाते हैं यह किस प्रकार से एक व्यक्ति को अपना जीवन जीना चाहिए न केवल भौतिक उपलब्धि बल्कि त्याग वैराग्य तपस्या साधना सभी के मेल जोल हम शिवजी में देखते हैं।  दक्ष प्रजापति के प्रसंग में भी हम देखते हैं की किस प्रकार से माता सती के जब शरीर का त्याग हो जाता है उसके पश्चात शिवजी दक्ष प्रजापति का वध कर देते हैं और ब्रह्मा जी के आने के पश्चात जब उन्हें समझाते हैं तब शिवजी तुरंत ही दक्ष प्रजापति को क्षमा कर देते हैं और उन्हे जीवित कर देते हैं।  हमारे जीवन में शिवजी अपने आचरण से हमें सिखाते हैं कि किस प्रकार से भगवत भक्ति ही एकमात्र हमारा उद्देश्य होना चाहिए जो मनुष्य जीवन को सा...

वैदिक जीवन शैली बनाम आधुनिक जीवन शैली

किसी दार्शनिक ने कही न कही बहुत ही सुंदर और कटु सत्य कहा था, यदि गाँव बर्बाद हुए , भारत भी बर्बाद हो जायेगा।  भारत फिर अपनी वास्तविक छवि को खो बैठेगा।  वास्तव में हमारे गांव में वैदिक पद्धति से जीवन जिया जाता था पर शायद अब वह बात गाँव में नहीं रह गयी।  कहने को तो गाँव अब भी है , आज भी मुर्गा सुबह बांग देता है , ठंडी और ताजी हवा आज भी बहती है, प्रदूषण शहरों की तुलना में आज भी गाँव में बहुत कम पाया जाता है ।  किन्तु अब वह भावना नहीं रह गयी, अब गाँव नरक बन चुका है। असली भारत बहुत ही गहरी नीद में सो रहा है। हमारे हृदय से दूसरों के प्रति प्रेम और सद्भावना कोशो दूर चली गयी है। दूसरों पर यहाँ तक की अब परिवार के सदस्यों पर भी विश्वास करना दुर्लभ है जबकि वैदिक काल में लोग दुश्मनों पर भी विश्वास करते थे। राजनिति जिससे हमारा दूर - दूर तक सम्बन्ध नहीं था, आज हर जगह बीमारी की तरह फ़ैल गयी है। गाँव का जीवन अब ईर्ष्या और द्वेष से भर चुका है,  जबकि पहले व्यक्ति जब तक उसका पडोसी भोजन नहीं कर लेता वह स्वयं भोजन नहीं करता और यदि वह भूखा सो रहा है तो पडोसी उसे अपने हिस्से का खि...