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Showing posts from April, 2023

भक्त वत्सल भगवान का अद्भुत रूप

भगवान् अपने भक्तों की रक्षा करने किसी भी रूप में आ सकते हैं फिर चाहे वे मनुष्य रूप में श्री राम के रूप, साक्षात् अपने मूल स्वरुप भगवान् श्री कृष्ण के रूप में अथवा अपने अद्भुत अवतार आधे शेर और आधे मनुष्य (नरसिंह ) के रूप में इससे वे बाध्य नहीं है।  भगवान् भगवद गीता के ४थे अध्याय के ९वें श्लोक में अर्जुन को  बताते हैं, कि हे अर्जुन जो मेरे जन्म और कर्म को दिव्य मानता हैं वह फिर इस दुखालय जगत में फिर से नहीं आता।  भगवान् भौतिक संसार के जीवों के जैसे बाध्य नहीं की किसी माता के गर्भ से ही जन्म ले, इसी बात को सत्य करने और हिरण्यकश्यपु जैसे महान राक्षस के भय से और अपने प्रिय भक्त प्रह्लाद की रक्षा करने भगवान् नरसिंह खम्भे से प्रकट हुए।  हिरण्यकशिपु को भगवान ब्रह्मा से विशेष वरदान प्राप्त था कि वह किसी मनुष्य, देवता, पशु या किसी अन्य प्राणी द्वारा नहीं मारा जा सकता था।  उसे न तो दिन में और न ही रात में किसी भी तरह के हथियार से मारा जा सकता था। तो, भगवान आधे मनुष्य, आधे शेर के रूप में प्रकट हुए और सभी शर्तों को पूरा करते हुए गोधूलि के समय हिरण्यकशिपु को अपने नाखूनों से म...

महाभारत का असली विलेन कौन?

वैसे भगवद गीता को हमारा पुरातन और सनातन वैदिक ग्रन्थ माना जाता है, जो भगवान् ने कुरुक्षेत्र में अर्जुन को सुनाई। भगवद गीता में मुख्य रूप से चार पात्र स्वयं भगवान् श्री कृष्ण, अर्जुन, संजय और धृतराष्ट है, पर प्रश्न यह उठता है कि गीता में इतने पात्र होते हुए भी गीता धृतराष्ट से ही क्यों शुरू हुई? वास्तव में यदि हम महाभारत की पृस्ठभूमि देखें तो हम समझ पाएंगे कि धृतराष्ट सक्रीय रूप से खलनायक नहीं है पर वे अपने ज्येष्ठ पुत्र दुर्योधन की आड़ में सम्पूर्ण संपत्ति को हड़पना चाहते थे।  धृतराष्ट का अर्थ ही धृत अर्थात धारण करना और राष्ट्र अर्थात सम्पूर्ण राज्य, जो सम्पूर्ण राज्य को अकेले ही धारण करना चाहता है और वह किसी भी प्रकार से फिर चाहे पांडवों को जहर देकर मारने की योजना बनाकर, लाख्यागृह में आग लगाकर या छल द्वारा जुएं में हराकर भरी सभा में द्रौपदी को निर्वस्त्र करना। वास्तव में दुर्योधन जन्म से ही आसुरी स्वाभाव वाला था, इसीलिए धृतराष्ट के छोटे भाई महाराज विदुर धृतराष्ट को जाकर कहते हैं कि यह पुत्र बड़े ही अपशगुन के साथ जन्म लिया है और इसके लक्षण सम्पूर्ण कौरवों के विनाश को सूचित करता है, बे...

जानिए कैसे पाँच महान पतिव्रता देवियों के नाम मात्र से पाप नष्ट हो जाते है ?

हमारे वैदिक शास्त्रों से ऐसे महान पतिव्रता स्त्रियों के चरित्र का वर्णन प्राप्त होता है जिससे न केवल हमारे समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं अपितु हमारा स्त्री जाति के प्रति सम्मान और अधिक बढ़ जाता है।  चाणक्य पंडित के अनुसार केवल अपनी पत्नी को छोड़कर शेष सभी स्त्रियों को माता अथवा बहन का दर्जा देना चाहिए जिससे न केवल हमारे अंदर एक आदर्श चरित्र का निर्माण होता है बल्कि हम धर्म के प्रति और सत्यनिष्ठ हो जाते हैं।  आज समाज में स्त्री -पुरुष का स्वछंद रूप से मेल - जोल न केवल सामाजिक वातावरण को ही दूषित नहीं कर रहा है अपितु स्त्रियों के प्रति काम वासना, भोग और ईर्ष्या को भी जन्म दे  रही है।  आज की स्त्रियों वैदिक स्त्रियों के चरित्र का अनुशरण न करके फ़िल्मी हिरोईनों की नक़ल कर रही है , जिनका स्वयं कोई चरित्र नहीं है।  हमारे वैदिक शास्त्रों से ऐसे पांच महान पतिव्रता स्त्रियों के चरित्र का वर्णन इस प्रकार प्राप्त होता है; अहल्या द्रौपदी सीता तारा  मंदोदरी  तथा । पंचकन्याः स्मरेन्नित्यं महापातकनाशनम् ।। अहिल्या, द्रौपदी, सीता, तारा और मंदोदरी - पाँच पुण्य देवियों का सदा ...

हनुमान जी के विशेष गुण

आज श्री हनुमान जी के जन्मोत्सव पर हम भगवान् श्री राम के अनन्य भक्त की कुछ विशेष गुण की चर्चा करेंगे। हनुमान जी की प्रजाति ही स्वंय में एक विशेष है, वानर अर्थात पशु है या मनुष्य संस्कृत शब्द वा का अर्थ होता है अथवा।  वैसे तो हनुमान जी असंख्य नाम है पर कुछ नाम जैसे बजरंग किस प्रकार यह नाम पड़ा, जब इंद्र ने राहु के कहने पर हनुमान जी को अपने वज्र से प्रहार किया और बाल हनुमान जब पृथ्वी पर अचेत अवस्था में गिर पड़े तब पवन देव के रुष्ट होने पर सभी देवता ब्रह्मा जी सहित आकर हनुमान जी को वरदान देते हैं।  देवराज इंद्र वरदान स्वरुप अपने वज्र से हनुमान जी को स्पर्श करते हैं और कहते हैं , आज से आप का शरीर वज्र के जैसा मजबूत हो जायेगा और कोई भी आपको क्षति नहीं पहुंचा सकेगा और इस प्रकार तब से हनुमान जी का एक नाम वज्रांग बलि अर्थात बजरंग बली के रूप में विख्यात हुए।  हनुमान जी के पास तो असंख्य गुण है, पर कुछ मुख्य गुणों की हम चर्चा करेंगे। 1. निःस्वार्थ सेवा भाव: जब प्रभु श्री राम रावण का वध कर और लंका पर विजय प्राप्त कर अयोध्या आये तब हनुमान जी को उन्होंने पूछा, मेरे प्रिय हनुमान यह युद्ध म...

अहंकार वश किसी का अपमान अर्थात स्वयं का विनाश

 प्रायः जब हम पद, प्रतिष्ठा एवं धन के मद में होते हैं तब सामने व्यक्ति की अवस्था को निम्न समझकर उसे उसकी छोटी सी गलती को लेकर उसका अपमान कर देते हैं, ऐसा इसलिए क्योंकि उस व्यक्ति के पास उतनी सामर्थ्य है की वह स्वयं को ही सबसे श्रेष्ठ समझता है। पर शायद हम यह भूल जाते हैं कि भगवान् श्री कृष्ण हमें गहना कर्मणों गति भगवद गीता ४.७ में बताते हैं कि हे अर्जुन!, कर्म की गति को समझना बहुत ही कठिन है इससे विद्वान से विद्वान लोग भी भ्रमित हो जाते हैं, पर तुम केवल अपने नियत कर्म को शास्त्र युक्त पूर्ण करने का प्रयास करो और निष्काम भाव से उसे  मुझे समर्पित करो इससे तुम कर्म बंधन से बच जाओगे।  जो व्यक्ति जैसे कर्म करता है उसे आज नहीं तो कल परिणामस्वरूप उसका फल भुगतना पड़ता है।  श्रीमदभागवतम के ४थे स्कन्द के २रे अध्याय में जब दक्ष प्रजापति ब्रह्मा जी द्वारा आयोजित यज्ञ में प्रवेश करते हैं और सभी श्रेष्ठ जन  उठकर उनका विनम्रता पूर्वक उनका स्वागत करते हैं, पर जैसे ही उनकी नजर शिवजी पर पड़ती है तो उन्हें बैठे हुए शिवजी पर क्रोध आता है।  वे शिवजी के ऊपर ईर्ष्या एवं क्रोध वश भरी...