किसी दार्शनिक ने कही न कही बहुत ही सुंदर और कटु सत्य कहा था, यदि गाँव बर्बाद हुए , भारत भी बर्बाद हो जायेगा। भारत फिर अपनी वास्तविक छवि को खो बैठेगा। वास्तव में हमारे गांव में वैदिक पद्धति से जीवन जिया जाता था पर शायद अब वह बात गाँव में नहीं रह गयी। कहने को तो गाँव अब भी है , आज भी मुर्गा सुबह बांग देता है , ठंडी और ताजी हवा आज भी बहती है, प्रदूषण शहरों की तुलना में आज भी गाँव में बहुत कम पाया जाता है । किन्तु अब वह भावना नहीं रह गयी, अब गाँव नरक बन चुका है। असली भारत बहुत ही गहरी नीद में सो रहा है। हमारे हृदय से दूसरों के प्रति प्रेम और सद्भावना कोशो दूर चली गयी है। दूसरों पर यहाँ तक की अब परिवार के सदस्यों पर भी विश्वास करना दुर्लभ है जबकि वैदिक काल में लोग दुश्मनों पर भी विश्वास करते थे। राजनिति जिससे हमारा दूर - दूर तक सम्बन्ध नहीं था, आज हर जगह बीमारी की तरह फ़ैल गयी है। गाँव का जीवन अब ईर्ष्या और द्वेष से भर चुका है, जबकि पहले व्यक्ति जब तक उसका पडोसी भोजन नहीं कर लेता वह स्वयं भोजन नहीं करता और यदि वह भूखा सो रहा है तो पडोसी उसे अपने हिस्से का खि...