इस भौतिक जगत में जब हम सुख भोगते रहते हैं तब हमें यह समझना चाहिए कि हमारा पुण्य क्षीण हो रहा है और जब हम कष्ट भोग रहे हैं तब हमें समझना चाहिए की हमारा पाप क्षीण हो रहा है। इस संसार में व्यक्ति जब सुख भोगता है तब यह भूल जाता है की उसका पुण्य क्षीण हो रहा है और उसे और अधिक पुण्य की आवश्यकता होगी और इस प्रकार हम पाप और पुण्य के चक्र में सदैव पड़े रहकर सुख और दुःख भोगते रहते हैं। पर यदि हम पाप और पुण्य कर्मों से बचना चाहते हैं तो हमें भगवान् श्री कृष्ण के चरण कमलो की शरण लेनी चाहिए ,क्योंकि भगवान् का एक नाम मुकुंद है जो हमें इस संसार से मुक्ति प्रदान कर सकते हैं। जो व्यक्ति भगवान् श्री कृष्ण की शरण ग्रहण करता है भगवान् उसको ज्ञान प्रदान करते हैं श्रीमद भगवद गीता में १०. १० श्लोक में भगवान् कहते हैं; तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् | ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते || १०. १०|| जो निरंतर मेरी प्रेमा भक्ति में लगा रहता है उसे मैं बुद्धि प्रदान करता हूँ जिससे वह मेरी शरण में आ सके। और ऐसा करते हुए मनुष्य ज्ञान में स्थिर रहकर भौतिक जगत में रहते हुए निम्...