ऐसा कहा जाता है, शिक्षण ही एक ऐसा पेशा है जो अन्य सभी पेशों का निर्माण करता है वह एक शिक्षक ही है जो हमारे भिन्न - भिन्न वर्ग के अन्य अधिकारीयों को तैयार करता है। शिक्षक होना कोई साधारण कार्य नहीं अपितु सबसे बड़ी जिम्मेदारी का कार्य है , हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि एक वयक्ति को राजा , पिता और शिक्षक तब तक नहीं बनना चाहिए जब तक वह अपने आधीन का उद्धार न कर सके। श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं, एक शिक्षक अथवा गुरु के अंदर निम्न गुण अवश्य होने चाहिए अन्यथा वह शिक्षक होने योग्य नहीं है; वाचो वेगं मनसः क्रोध-वेगं, जिह्वा वेगं उदरोपस्थ वेगं। जो अपने वाणी के वेग को, मन के वेग को, क्रोध के वेग को, जिह्वा के वेग को , उदर के वेग को तथा जननांगो के वेग को सहन कर सकता है वही इस संसार में शिक्षक बनने योग्य है। भगवान् श्री कृष्ण भी भगवत गीता में कहते हैं, जैसा कोई श्रेष्ठ व्यक्ति आचरण करता है उसी को प्रमाणित मानकर उनके अनुयाई भी वैसा करते हैं यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः । स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥ 3. 2 1 ॥ महापुरुष जो भी कर्म करते हैं, सामा...