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Showing posts from November, 2022

हम जानते हुए भी गलती क्यों करते हैं ?

प्रायः हम सभी का यही प्रश्न होता है और यह एक व्यक्ति का नहीं अपितु ९० प्रतिशत लोगों की समस्या है, की हम न चाहते हुए भी गलती क्यों कर बैठते हैं जबकि थोड़ी ही देर के पश्चात हम उसपर पछतावा करते हैं।  तो इसका उत्तर हम भगवद गीता के अध्याय ३ श्लोक संख्या ३६ एवं ३७ में देखेंगे जो स्वयं अर्जुन भगवान् श्री कृष्ण से यही प्रश्न पूछते हैं कि, हे कृष्ण! मनुष्य न चाहते हुए भी पापकर्मों के लिए प्रेरित क्यों होता है? ऐसा लगता है उसे बलपूर्वक उनमें लगाया जा रहा हो।  अर्जुन उवाच अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः । अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः ॥ ३.३६ ॥ भगवान् कृष्ण अर्जुन को उनके प्रश्नों का उत्तर देते हुए कहते हैं , श्री भगवानुवाच काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भ‍वः । महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥ ३. ३७ ॥ भगवान् श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं, अर्जुन ! इसका कारण रजोगुण के संपर्क से उत्पन्न काम है, जो बाद में क्रोध का रूप धारण करता है और जो इस संसार का सर्वभक्षी पापी शत्रु है।  वास्तव में जीव न चाहते हुए पाप तभी करता है जब वह स्वंत्रता का दुरूपयोग करता है, प्रकृति के रजोगुण ...

क्या हम सही मायने में जानते हैं अतिथि देवो भवः का अर्थ?

प्रायः ऐसा हम ऐसा लोगों से सुनते हैं कि अतिथि भगवान् का रूप होते हैं पर क्या हम सही मायने में इसका मतलब और ठीक प्रकार से इसे व्यव्हार में लाते है। अतिथि का अर्थ होता है जो बिना किसी तिथि के आपके घर आये जिसकी कोई पूर्वनियोजित तिथि न हो और देव उन्हें इसलिए कहा जाता है क्योंकि अतिथि को भगवान् एक प्रतिनिधि के रूप में आपके घर भेजते हैं जो आपके व्यव्हार से भगवान् के प्रति प्रेम को अवगत कराता है।  ऐसे तो हमारे भारतीय परम्परा में अतिथियों का बड़े ही आदर के साथ सम्मान किया जाता था फिर चाहे वह अमीर हो या गरीब पर बदलते समय और भौतिक प्रगति के कारण लोंगो में संस्कार के प्रति कोई रुझान नहीं रह गया जिससे यह परम्परा धीरे- धीरे लुप्त होती जा रही है।  श्रीमद भागवतम में इसका प्रमाण मिलता है स्कन्द ४ अध्याय २२ श्लोक १०  अधना अपि ते धन्या: साधवो गृहमेधिन: । यद्गृहा ह्यर्हवर्याम्बुतृणभूमीश्वरावरा: ॥ ४. २२ १० ॥ एक व्यक्ति कितना सम्बृद्धिशाली है इसका पता उसके धन, ऐश्वर्य और सम्पत्ति एवं परिवार से नहीं अपितु वह किस प्रकार से अतिथि का सत्कार करता है उसपर निर्भर करता है।   जो व्यक्ति ऊँचे ...

गीता से जीवन में शत प्रतिशत बदलाव संभव

श्रील प्रभुपाद आज से लगभग ५० वर्ष पूर्व जब पाश्चात्य जगत में गए और वहां लोंगो को वैष्णव धर्म की शिक्षा का पाठ पढ़ा रहे थे तभी बहुत सारे लोंगो ने उनसे प्रश्न किया, आप ने भगवद गीता को ही अपने प्रचार का आधार क्यों चुना? श्रील प्रभुपाद ने बताया श्रीमद भगवद गीता एक ऐसा दिव्य ग्रन्थ है जो चार वेदों, १८ पुराणों, १०८ उपनिषदों तथा दो महान ऐतिहासिक ग्रंथों रामायण एवं महाभारत का सार रूप है जो आज के युग के लिए अत्यंत प्रभावशाली है।  श्रीमद भागवतम में वर्णन आता है की कलियुग में लोगों की बुद्धि मंद, अभागे तथा कलुषित रहने वाले रहेंगे जिन्हे न तो इतनी बुद्धि होगी जो इतने सारे वैदिक ग्रंथो को समझ पाएं और न ही उनके पास इतना पर्याप्त समय होगा,  इसलिए एकमात्र श्रीमद भगवद गीता ही एक विकल्प बचता है जो मानव कल्याण के लिए सर्वोत्तम औषधि है।  श्रीमद भगवद गीता में मुख्यतः ५ विषय हैं ईश्वर (कृष्ण),  जीव , प्रकृति , काल एवं कर्म। इनमें से ऊपर के चार विषय हमारे नियंत्रण के बाहर है केवल कर्म ही एक विषय है जिसका नियंत्रण केवल हमारे हाँथ में है।  मनुष्य अपने कर्मों द्वारा अपनी स्वंत्रता का उपयो...

एक भक्त की प्रसन्नता का रहस्य !

आवश्यकता से अधिक संचय न करना :   एक भक्त को केवल उतनी ही आय के लिए काम करना होता है जितना उसके लिए नितांत आवश्यक होता है वह अनावश्यक रूप से अधिक श्रम करके धन उपार्जन नहीं करता वह अपनी आय से हमेशा संतुष्ट रहता है। अपने बल्कि वह अपने कीमती समय का सदुपयोग कृष्ण भक्ति में लगाता है जिससे उसके सारे कार्य बड़ी आसानी से सम्पूर्ण हो जाते है और वह शांत एकाग्रचित मन से भगवान् श्री कृष्ण की सेवा में सलग्न रहता है।  असल में एक व्यक्ति को उसके पूर्व कर्मो के आधार पर सुख और दुःख की प्राप्ति होती है उसमें उसका इस जीवन में कोई लेना - देना नहीं होता। इस संसार में हर व्यक्ति सुख के लिए अथाह परिश्रम कर रहा है पर शायद ही किसी को उसके अपने प्रयास से सुख मिल रहा हो, ज्यादातर लोग दुःख से ही पीड़ित है।  आवश्यकता से अधिक भोजन न करना :  एक भक्त केवल कृष्ण को अर्पित भोजन ही ग्रहण करता है वह अनावश्यक रूप से कुछ भी खाता - पीता नहीं रहता। प्रायः ऐसा कहा जाता है, जैसा अन्न वैसा मन व्यक्ति जिस प्रकार का भोजन करता है ठीक उसी प्रकार से उसका मन, बुद्धि और विचार का निर्माण होता है।  जिस व्यक्ति ने ...

भीष्म पंचक व्रत - श्रील भीष्म देव स्तुति

चातुर्मास जो भक्ति के लिए बहुत ही अनुकूल माना जाता है और ऐसा सभी ग्रंथों में इसका प्रमाण मिलता है की यदि व्यक्ति चातुर्मास का थोड़ा भी नियम पालन करके भक्ति में दृढ़ता से आगे बढ़ता है तो निश्चित रूप से उसकी प्रगति होती है।  पर यदि कोई चातुर्मास व्रत का पालन कर पाने में असमर्थ है तो उसके लिए कार्तिक मास जो सभी महीनो में (चातुर्मास का अंतिम महीना ) सबसे दिव्य माना जाता है और पद्म पुराण में श्री नारद मुनि और सत्यव्रत मुनि के संवाद से इसकी दिव्यता का पता चलता है कि किस प्रकार यदि व्यक्ति इस पवित्र महीने में श्री यशोदा दामोदर को दीप - दान करने से उसके सभी पापों का नाश हो जाता है और अंततोगत्वा भगवान् के धाम को प्रवेश मिलता है।  उसमें भी यदि कोई आलस्य करता है और कार्तिक व्रत का पूर्ण रूप से पालन नहीं करता तो उसके लिए भीष्म पंचक व्रत का एक विशेष अवसर दिया जाता है, और यदि कोई आखिरी के केवल ५ दिनों का भी व्रत पालन कर लेता है तो उसे सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है और अंत में भगवद प्राप्ति होती है।  श्रीमद भागवतम में प्रथम स्कन्द के ९वें अध्याय के ३२वें श्लोक से ४४वें श्लोक तक श्रील भीष्...