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Showing posts from October, 2022

जिनकी माया सबको बांधती है उनको मैया ने बाँधा

श्री श्री राधा दामोदर लीला भगवान् की एक ऐसी लीला है जो बड़े-बड़े देवतााओं, ऋषियो-मुनियों को भी चकित करने वाली है तो हम जैसे साधारण जीवों की बात ही क्या है ? भगवान् भगवद गीता के चतुर्थ अध्याय के ९ वे श्लोक में कहते हैं, हे अर्जुन जो मेरे जन्म और कर्म की दिव्यता को जान लेता है वह अंत समय में मेरे सनातन धाम को प्राप्त होता है।  यहाँ पर भगवान् को यह कहने की आवश्यकता क्यों पड़ी ? क्योंकि वे जानते हैं कि संसार में ऐसे बहुत से लोग हैं जो भगवान् की दिव्यता को स्वीकार न करके उनको एक साधारण मनुष्य मानते हैं।  कहते हैं अर्जुन को जब भगवान् श्री कृष्ण ने अपना विराट रूप दिखाया तब अर्जुन ने भगवान् को सखा के रूप में नहीं अपितु भगवान् जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के रचयिता हैं के रूप में स्वीकार किया।  इस दामोदर ऊखल बंधन लीला से जो माता यशोदा के भय से कृष्ण भाग रहें हैं और उनके आंखे लाल हो गयी हैं ऐसे प्रतीत हो सकता हैं कि यदि वे भगवान् हैं तो एक छड़ी से कैसे डर सकते हैं ? काल जिनसे भयभीत होता है वैसे भगवान् श्री कृष्ण मैया यशोदा के प्रेम भक्ति के कारण वात्सल्य भाव से अपने आपको भक्त के अधीन कर देते...

शिक्षित पीढ़ी के अशिक्षित आचरण

श्रीमद भागवतम के तीसरे स्कंद के चौबीसवें अध्याय में जब कर्दम मुनि अपने पुत्र भगवान् श्री कपिल मुनि को कहते हैं की अब आपकी माँ  देवहुति आपके संरक्षण में है कहकर वन गमन के लिए प्रस्थान करते हैं।  वहां पर भगवान् श्री कपिल मुनि अपनी माता देवहूति का पूर्ण रूप से संरक्षण करते है और साथ ही साथ वे उन्हें भगवत प्राप्ति का मार्ग भी दिखाते हैं जिससे वे अपने मनुष्य जन्म को सार्थक कर सके।  यह एक वैदिक परम्परा है की जब पुत्र बड़ा हो जाय तब उसे सभी जिम्मेदारी को सौंप कर पिता को भगवद्प्राप्ति में लग जाना चाहिए और एक पुत्र को भी चाहिए की अपने पिता की अनुपस्थिति में माता का पूर्ण रूप से ध्यान रखें जिससे उन्हें उनके पति की कमी न महसूस हो।  पर आज कल बच्चों में एक ऐसी मानसिकता देखी जा रही है कि जब वे कॉन्वेंट स्कूल या कालेजों में जाने लगते हैं तो उन्हें माता - पिता, दादा - दादी इत्यादि को लेकर बड़ी हीन भावना हो जाती है कि इन्हे तो अंग्रेजी बोलनी नहीं आती, इन्हे मॉडर्न कपडे पहनने नहीं आते और इस कारण वे सोचते हैं की ये लोग पिछड़े और अशिक्षित लोग हैं।  ऐसी ही घटना एक शिक्षित पीढ़ी के अशिक्...

बेहतर जिंदगी या बदतर जिंदगी के लिए संघर्ष?

श्रीमद भागवतम और अन्य हमारे वैदिक ग्रन्थ इस बात के लिए सदैव हमें आगाह करते रहते हैं कि आप सतर्क रहें कि आपके जीवन का लक्ष्य क्या है ? पर अक्सर हम इस दुनिया के चकाचौध में भूल जाते हैं कि हमारा वास्तविक लक्ष्य क्या है और बिना लक्ष्य के या यूँ कहें तो निर्थक लक्ष्य को ही हम अपना लक्ष्य मान बैठते हैं।  इस देश के युवाओं में दो चीज मुख्य रूप से पायी जाती है, एक तो वे लक्ष्यविहीन जीवन जी रहे हैं और दूसरा  फिर भी उनको अति आत्मविश्वास (औवरकॉन्फिडेन्स) है कि वे बिलकुल सही हैं उन्हें किसी के मार्गदर्शन की कोई आवश्यकता नहीं।  कल हमारी भेट कुछ नवयुवको के हुई और किस प्रकार वे भ्रमित और माया द्वारा पीड़ित है उसका हम कुछ वाकया आपके साथ साझा करना चाहते हैं और यह केवल उन दो - चार युवकों की बात नहीं अपितु सभी नवयुवकों को एक सन्देश है।  हम कुछ पुस्तकें उन्हे दिखा रहे थे और प्रेरित कर रहे थे कि अपने वैदिक ग्रंथों के बारे में आप जाने समझे और अपने जीवन को इस झूठे चका -चौध में बर्बाद न कर दे।  उसमें एक युवक अच्छी किस्म की घडी, महंगी बाईक, महंगे कपडे पहने हुआ था।  मैंने उसे प्रश्न क...

घर में चार प्रकार के शत्रु कौन!

 गृहस्थ जीवन एक आश्रम हैं और यह सभी आश्रमों में श्रेष्ठ माना जाता हैं क्योंकि इस पर अन्य तीन आश्रम ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ और सन्यास निर्भर रहता है। पर यदि घर के सदस्य एक दूसरे से प्रेमपूर्वक न रहकर भगवान् को केंद्र में रखकर उनकी सेवा न करके अपनी - अपनी इन्द्रियतृप्ति में लगे हैं तब वह गृहस्थ नहीं गृहमेधि बन जाता है और उसका जीवन नर्क तुल्य हो जाता है।   आश्रम का अर्थ पवित्रता से हैं जहाँ हर व्यक्ति पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की सेवा में लगकर सुखी और सप्पन्न जीवन व्यतीत करते हैं पर यदि जिस घर में भगवान् और उनके भक्तों का सम्मान नहीं होता वहां हर व्यक्ति एक दूसरे से एक प्रकार के दुश्मन बने रहते हैं।  रावण के अनुसार ऐसे दुश्मन बाहर वालों से ज्यादा खतरनाक होते हैं, रावण विभीषण के लंका से चले जाने के बाद  कहता है, एक व्यक्ति को बाहर वालो से ज्यादा खतरा उसके घर वालो से रहता है। क्योंकि जब व्यक्ति स्वार्थी होता है तब वह किसी भी हद तक जा सकता है।  चाणक्य पंडित के अनुसार घर में चार प्रकार के शत्रु है।  १. अगर पिता कर्ज में है तो उसे दुश्मन माना जाता है - कहते हैं यद...