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वैकुंठ लोक में द्धेष और काम के लिए कोई स्थान नहीं

इस भौतिक जगत में जीव उस आनंद की खोज में भटक रहा है जिसे वह कभी - कभी अनुभूति स्वरूप प्राप्त करता है पर उसकी तलाश कभी पूर्ण नहीं होती। चूँकि यह भौतिक संसार आध्यात्मिक संसार का प्रतिबिम्ब स्वरुप है इसलिए यहाँ वास्तविक सुख और आनंद कभी भी प्राप्त नहीं किया जा सकता। यहाँ रजो और तमों गुण के कारण हर व्यक्ति ईर्ष्या और काम के वशीभूत रहता है पर बैकुंठ में शुद्ध सतोगुणी होने के कारण वहां ईर्ष्या और काम का लेश मात्र भी नहीं है।  श्रीमद भागवतम के तृतीय स्कंद के पन्द्रहवें अध्याय में वैकुण्ठ लोक का वर्णन आता है और बताया जाता है की किस प्रकार ब्रह्मा के चार कुमार पुत्र जो कि एक पांच वर्षीय बालक के रूप में विचरण करते भौतिक जगत से आध्यात्मिक लोकों में प्रवेश कर गएँ और उन्होंने वैकुण्ठ के ६ द्वारों को भी पार कर लिया पर जब वे आखिरी द्वार पर पहुंचे तो वहां खड़े दो द्वारपालों जय तथा विजय द्वारा उन्हें रोक लिया गया।  वहां सभी वस्तु चर है फिर चाहे वह पौधे, जल, पुष्प अथवा पशु हैं सभी में एक ही भावना रहती है की किस प्रकार भगवान् श्री कृष्ण की सेवा की जाय।  ऐसा बताया जाता की सभी पक्षियों में जब वे...