भगवान् श्री कृष्ण भगवद गीता ४. ९ वे अध्याय में कहते हैं जन्म कर्म च में दिव्यम .. कि हे अर्जुन मेरा जन्म और कर्म दिव्य हैं और जो इस बात को जानता है वह फिर कभी इस मृत्युलोक में वापस नहीं आता है जो कि सभी प्रकार के कष्टों से भरा पड़ा है। इसी प्रकार भगवान वराह श्रीमद भागवतम के तृतीय स्कन्द के १३ वें अध्याय में इसका वर्णन आता है जब एक शूकर के रूप में प्रकट हुए तब भी उनकी दिव्यता उसी प्रकार बनी रही वैसे शूकर इस संसार का सबसे निकृष्ट प्राणी माना जाता है पर भगवान् जब उस अवतार में आये तो जन लोक , तप लोक तथा सत लोक तीनो लोकों के प्राणी भगवान् को नमस्कार कर उनकी स्तुति करने लगे। उन्हें पूर्ण विश्वास हो गया की यह कोई साधारण शूकर नहीं क्योंकि उनका तेज पूरे ब्रह्माण्ड में देदीप्यमान कर रहा था, वेदो की स्तुतियों को सुनने के बाद भगवान् वराह गर्भोदक सागर से निकलकर अपने बालो को इस प्रकार झटकते हैं कि सभी तीनों लोको के निवासियों उनके इस जल से तृप्त हो जाते हैं। भगवान् के इस बाल के अग्र भाग का जल अथवा भगवान् के अगूंठे से निकली गंगा का जल में कोई अंतर् नहीं है। भगवान् सभी को अपना दर्...