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Showing posts from May, 2023

पांडवा निर्जला एकादशी महात्म्य

वैसे एकादशी को हम दो कारणों के द्वारा जान सकते हैं कि यह हमारे आध्यात्मिक एवं स्वास्थ्य दोनों दृष्टिकोण से कितना महत्वपूर्ण है।  एकादशी का दूसरा अर्थ "हरिवास" या "माधव तिथि" के नाम से जाना जाता है, जिसका अर्थ है की कृष्ण के नजदीक होना और अपनी ११ इन्द्रियों (५ कर्म + ५ ज्ञान + १ मन) को भगवान् की सेवा में लगाना। एकादशी महीने में दो बार आती है और उस दिन हम अन्न का उपवास रखकर केवल थोड़े फल अथवा जल से अपने आप को तृप्त करते हैं।  वैज्ञानिक कारणों को यदि देखा जाय तो महीने में २ बार हमारे शरीर को आराम देना चाहिए क्योंकि हमारे पाचन शक्ति अत्यधिक कमजोर पड जाती है और एक दिन यदि हम इसे आराम देते हैं तो पुनः वह ठीक - ठीक कार्य करना प्रारम्भ कर देती है।  आध्यात्मिक कारण को देखें तो यदि हम जिस दिन उपवास रखते हैं उस दिन हमारी इन्द्रियाँ शिथिल पड़ जाती है और ज्यादा परेशान  नहीं करतीं, इस कारण से हम अपनी इन्द्रियों साथ ही साथ मन को बड़ी आसानी से नियंत्रण में ला सकते हैं।  एकादशी तिथि के दिन ही भगवान् विष्णु की अंतरंग शक्ति "एकादशी" ने दैत्य मूरा का वध किया था, तब से उस तिथि का...

आज आधुनिक समाज सुखी क्यों नहीं है?

आधुनिक समाज में श्रमिकों तथा पूजीपतियों में सदैव एक बड़ा झगड़ा चलता रहता है।  यह झगड़ा अंतराष्ट्रीय स्तर तक पहुँच गया है। पूजीपतियों तथा श्रमिकों में स्वामित्व जताने की होड़ में एक दूसरे से कुत्ते-बिल्लियों जैसे लड़ने की प्रवित्ति देखि गयी है। और इस प्रकार से समाज में कभी भी शांति नहीं हो सकती, जब तक हर एक व्यक्ति संसार की प्रत्येक वस्तुओं पर अपना अधिकार जताने का प्रयास करता रहेगा।  ईशोपनिषद का यह शब्द 'ईशावास्य ' अत्यन्त ही महत्वपूर्ण है और हर किसी को यह जानना चाहिए की संसार की प्रत्येक वस्तु पर एकमात्र केवल भगवान् श्री कृष्ण का अधिकार है और भगवान ने जो हमें प्रदान किया है केवल उतने भाग को ग्रहण करते हुए हमें संतुष्ट रहकर अपना जीवन व्यतीत करना चाहिए , और यदि प्रत्येक व्यक्ति इस सिद्धांत को अपने जीवन में उतारता है तो वह सदैव प्रसन्न और सुखी जीवन व्यतीत कर सकता है। सामायन्तः समाज में हम देखते हैं कि मनुष्य अत्यधिक संचय करने की होड़ में रहता है और इस प्रकार वह जाने - अनजाने दूसरे की संपत्ति को भी चुरा लेता है और पाप का भागीदार बनता है, श्रील प्रभुपाद इसका उदाहरण उपदेशामृत में भी प्रस्...

हम अपने जीवन में दुखों से छुटकारा कैसे पाएं !

इस भौतिक जगत में जब हम सुख भोगते रहते हैं तब हमें यह समझना चाहिए कि हमारा पुण्य क्षीण हो रहा है और जब हम कष्ट भोग रहे हैं तब हमें समझना चाहिए की हमारा पाप क्षीण हो रहा है।  इस संसार में व्यक्ति जब सुख भोगता है तब यह भूल जाता है की उसका पुण्य क्षीण हो रहा है और उसे और अधिक पुण्य की आवश्यकता होगी और इस प्रकार हम पाप और पुण्य के चक्र में सदैव पड़े रहकर सुख और दुःख भोगते रहते हैं।  पर यदि हम पाप और पुण्य कर्मों से बचना चाहते हैं तो हमें भगवान् श्री कृष्ण के चरण कमलो की शरण लेनी चाहिए ,क्योंकि भगवान् का एक नाम मुकुंद है जो हमें इस संसार से मुक्ति प्रदान कर सकते हैं।  जो व्यक्ति भगवान् श्री कृष्ण की शरण ग्रहण करता है भगवान् उसको ज्ञान प्रदान करते हैं श्रीमद भगवद गीता में १०. १० श्लोक में भगवान् कहते हैं; तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् | ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते || १०. १०|| जो निरंतर मेरी प्रेमा भक्ति में लगा रहता है उसे मैं बुद्धि प्रदान करता हूँ जिससे वह मेरी शरण में आ सके।  और ऐसा करते हुए मनुष्य ज्ञान में स्थिर रहकर भौतिक जगत में रहते हुए निम्...

भगवान की कृपा से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं !

श्रीमद भागवतम के ४थे स्कन्द के ८वें अध्याय में महाराज ध्रुव जब अपनी विमाता सुरुचि के अपमान जनक शब्दों को सुनकर सर्प की भांति फुफकारते हुए अपनी माँ सुनीति के पास जाकर सारा वृतांत सुनाते हैं।  तब माता सुनीति ध्रुव महाराज को सांत्वना देते हुए कहती है, हे पुत्र तुम्हारी माँ सुरुचि जो वचन तुम्हे कहे हैं भले ही वह क्रोध में कहे गए हो पर सत्य है, यदि तुम्हे अपनी पिता के गोद में बैठना है तो तुम्हे पूर्ण परुषोत्तम भगवान् विष्णु की ही शरण ग्रहण करनी चाहिए , वही एकमात्र व्यक्ति हैं जो तुम्हे वह पद प्रदान कर सकते हैं।  माता सुरुचि ने जो अपने सौतेले पुत्र ध्रुव महाराज के प्रति कड़वे बचन कहे थे वे सत्य थे, क्योंकि जब तक किसी पर भगवान की कृपा नहीं होती, तब तक उसे जीवन में कोई सफलता नहीं मिल सकती।  जीवन की सफलता का मापदंड इस जन्म के भौतिक सुख तथा अगले जन्म में मोक्ष प्राप्ति के द्वारा किया जा सकता है, और ऐसी सफलता परम भगवान् श्री कृष्ण की कृपा से ही संभव है। केवल मात्र कठिन परिश्रम से ही सफलता नहीं मिलती, हमारे परिश्रम के साथ - साथ भगवान् की कृपा भी बहुत आवश्यक है।  कोई कितना भी...

आधुनिक शिक्षा अशिक्षा से भी ज्यादा खतरनाक

 आज से दशक पहले यदि हम देखें तो शिक्षा का स्तर उतना नहीं था जितना तथाकथित शिक्षित आज की युवा पीढ़ी है। आज की आधुनिक शिक्षा प्रणाली में एक छोटा बालक भी अपने आप को स्वतंत्र समझता है और अपने ही शिक्षक को आँख दिखाता है और सम्मान नहीं करता।  आज के त्रुटिपूर्ण शिक्षा के कारण ही विश्वभर में युवा विद्यार्थी अपने शिक्षक एवं माता - पिता के लिए सिरदर्द बने हुए हैं। इस बात को हमें स्वीकार करना ही होगा कि शिक्षित वर्ग अनपढ़ वर्ग से ज्यादा खतरनाक साबित हो रहे हैं।  आज एक अनपढ़ व्यक्ति केवल अपना व्यक्तिगत नुक्सान करता है, पर वहीँ एक पढ़ा लिखा पुरे समाज के लिए बीमारी बन जाता है, कारण उसकी बुद्धि एक अनपढ़ की तुलना में ज्यादा विकसित है।।  आज स्कूल और कालेजों में न तो ब्रह्मचर्य की शिक्षा दी जा रही है और न ही उन्हें किसी शास्त्रीक ज्ञान की फिर उनके अंदर वास्तविक ज्ञान कैसे उत्पन्न होंगे क्योंकि कालेज और किताबी ज्ञान से वे केवल बुद्धि का अच्छी तरह दुरूपयोग करना ही सिखाया जा रहा है और हम उम्मीद करते हैं कि हमारी भावी पीढ़ी बड़ी उन्नत और समाज के लिए हितकर साबित होगी, यह तो उसी तरह हुआ ...

प्रह्लाद महराज के दिव्य उपदेश

प्रह्लाद महराज दैत्यराज हिरण्यकशयपु के पुत्र होने के बावजूद भी साधु संग प्राप्त होने के नाते उन्हें दिव्य ज्ञान प्राप्त हुआ।  जब प्रह्लाद महाराज अपनी माता कयाधु के गर्भ में थे तब देवर्षि श्री नारद मुनि ने उनको श्रीमद भागवतम का ज्ञान दिया, और ऐसे दिव्य ज्ञान को प्राप्त कर प्रह्लाद महराज जन्म से ही भगवान् श्री हरी विष्णु के भक्त बन गए , और अपने असुर मित्रों को भी शिक्षा दे रहे हैं कि आप सब भी भगवान् विष्णु की भक्ति करो जिससे आपको शाश्वत सुख प्राप्त हो।  इन्द्रिय सुख के लिए इतना कठिन प्रयास करने की आवश्यकता नहीं है। आपके पास जो भी शरीर है, उसके अनुसार वह सुख बिना किसी प्रयास के आएगी। वह व्यवस्था पहले से ही प्रकृति द्वारा बनाई गई है और अपने आप आ जाएगी, जैसे कि दुख अपने आप आ जाता है वैसे ही आपके प्रारब्ध अनुसार आपका सुख भी आएगा। लेकिन जीवन में सबसे प्रिय चीज क्या है, इसकी समझ विकसित करने की जरूरत है। हम में से प्रत्येक अपने सबसे प्रिय मित्र की तलाश कर रहा है। वह सबसे प्रिय मित्र सर्वोच्च भगवान, श्री कृष्ण हैं। वह हर किसी के दिल में हैं और वह हमें हमेशा के लिए हमें संतुष्ट...