प्रायः हम भय अथवा ईर्ष्या के कारण दूसरों को प्रोत्साहित नहीं करना चाहते क्योंकि हमको ऐसा लगता है की शायद यदि मैंने इस व्यक्ति को प्रोत्साहित किया तो कही यह मेरी जगह तो नहीं ले लेगा। पर यदि हम देखें तो हमारा शाश्त्र सदैव दूसरे को प्रोत्साहित करने में लगे रहते हैं जिसके कारण उनकी स्वयम की ख्याति बढ़ती है। ऐसा देखा जाता हैं यदि हम सुगन्धित फूल को किसी और को प्रदान करने के लिए उठाते हैं तो हमारा स्वयं का हाँथ सुगन्धित हो उठता है ठीक उसी प्रकार यदि हम अपने जीवन में किसी को प्रोत्साहित करते हैं तो हमारा स्वयं का जीवन प्रोत्साहन से भर जाता हैं अन्यथा हमारा जीवन निराश और दुखी प्रतीत होता है। भगवान श्री राम के चरित्र श्री रामायण के एक प्रसंग से हम देख सकते हैं की किस प्रकार जब महाराज सुग्रीव की सेना में सभी बंदर, भालू निराश होकर बैठ गए तब जांबवंत जी हनुमान जी को प्रोत्साहित करते हैं कि हे पवनपुत्र आप के लिए तो यह कार्य जैसे कोई छोटे बच्चों का खेल शायद आपको याद नही किस प्रकार की अद्भुत शक्ति आपके अंदर है, कृपया उठिए और बिना विलम्ब किये भगवान् श्री राम के इस कार्य को पूर्ण क...