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धर्म और अधर्म की शिक्षा !

धृतराष्ट्र की प्रसन्नता की कोई सीमा नहीं जब उसे इस बात का पता चला की उसके सारे १०० पुत्र और उसमें भी ज्येष्ठ दुर्योधन अत्यंत शक्तिशाली और कूटनीतिज्ञ हो गए हैं और अब वे राज्य के उत्तरदायित्य के लिए सर्वथा उपयुक्त हैं।  इससे धृतराष्ट्र  की मानसिकता का पता चलता है की धृतराष्ट्र न केवल भौतिक दृश्टिकोण से अँधा अपितु वैचारिक रूप से भी अँधा था उसे यह पता होते हुए भी कि उसके सारे पुत्र अधर्म और अनैतिकता के रास्ते पर चल रहे हैं फिर भी वह प्रसन्न है केवल इस बात से की अब राज्य का अधिकारी हमारा पुत्र दुर्योधन होगा न की पाण्डु के पुत्र युधिष्ठिर।  वह इस बात से भी आस्वस्त था की  यदि पांडव कदाचित हमारे पुत्रों से युद्ध भी करते हैं तो वे जीत नहीं पायंगे क्योंकि हमारे पुत्रों की संख्या उनसे कई गुना ज्यादा है।  धृतराष्ट्र  कभी भी दुर्योधन और अन्य पुत्रों को धर्म की शिक्षा न देकर केवल भौतिक शक्ति को बढाने की शिक्षा देता रहा और वही दूसरी तरफ पांच पांडवों की माता कुंती जो अपने पुत्रों को केवल धर्म की शिक्षा देती रहीं।  दुर्योधन बड़ा होने पर अपनी कूटनीति के कारण पांडवों को र...