Skip to main content

Posts

Showing posts from August, 2022

वैकुंठ लोक में द्धेष और काम के लिए कोई स्थान नहीं

इस भौतिक जगत में जीव उस आनंद की खोज में भटक रहा है जिसे वह कभी - कभी अनुभूति स्वरूप प्राप्त करता है पर उसकी तलाश कभी पूर्ण नहीं होती। चूँकि यह भौतिक संसार आध्यात्मिक संसार का प्रतिबिम्ब स्वरुप है इसलिए यहाँ वास्तविक सुख और आनंद कभी भी प्राप्त नहीं किया जा सकता। यहाँ रजो और तमों गुण के कारण हर व्यक्ति ईर्ष्या और काम के वशीभूत रहता है पर बैकुंठ में शुद्ध सतोगुणी होने के कारण वहां ईर्ष्या और काम का लेश मात्र भी नहीं है।  श्रीमद भागवतम के तृतीय स्कंद के पन्द्रहवें अध्याय में वैकुण्ठ लोक का वर्णन आता है और बताया जाता है की किस प्रकार ब्रह्मा के चार कुमार पुत्र जो कि एक पांच वर्षीय बालक के रूप में विचरण करते भौतिक जगत से आध्यात्मिक लोकों में प्रवेश कर गएँ और उन्होंने वैकुण्ठ के ६ द्वारों को भी पार कर लिया पर जब वे आखिरी द्वार पर पहुंचे तो वहां खड़े दो द्वारपालों जय तथा विजय द्वारा उन्हें रोक लिया गया।  वहां सभी वस्तु चर है फिर चाहे वह पौधे, जल, पुष्प अथवा पशु हैं सभी में एक ही भावना रहती है की किस प्रकार भगवान् श्री कृष्ण की सेवा की जाय।  ऐसा बताया जाता की सभी पक्षियों में जब वे...

दूसरों को प्रोत्साहित करना सबसे अच्छा उपहार है जो आप खुद को दे सकते हैं!

प्रायः हम भय अथवा ईर्ष्या के कारण दूसरों को प्रोत्साहित नहीं करना चाहते क्योंकि हमको ऐसा लगता है की शायद यदि मैंने इस व्यक्ति को प्रोत्साहित किया तो कही यह मेरी जगह तो नहीं ले लेगा।  पर यदि हम देखें तो हमारा शाश्त्र सदैव दूसरे को प्रोत्साहित करने में लगे रहते हैं जिसके कारण उनकी स्वयम की ख्याति बढ़ती है।  ऐसा देखा जाता हैं यदि हम सुगन्धित फूल को किसी और को प्रदान करने के लिए उठाते हैं तो हमारा स्वयं का हाँथ सुगन्धित हो उठता है ठीक उसी प्रकार यदि हम अपने जीवन में किसी को प्रोत्साहित करते हैं तो हमारा स्वयं का जीवन प्रोत्साहन से भर जाता हैं अन्यथा हमारा जीवन निराश और दुखी प्रतीत होता है।  भगवान श्री राम के चरित्र श्री रामायण के एक प्रसंग  से हम देख सकते हैं की किस प्रकार जब महाराज सुग्रीव की सेना में सभी बंदर, भालू निराश होकर बैठ गए तब जांबवंत जी हनुमान जी को प्रोत्साहित करते हैं कि हे पवनपुत्र आप के लिए तो यह कार्य जैसे कोई छोटे बच्चों का खेल शायद आपको याद नही किस प्रकार की अद्भुत शक्ति आपके अंदर है, कृपया उठिए और बिना विलम्ब किये भगवान् श्री राम के इस कार्य को पूर्ण क...

एक अद्भुत शूकर - भगवान् वराह का प्राकट्य

भगवान् श्री कृष्ण भगवद गीता ४. ९ वे अध्याय में कहते हैं जन्म कर्म च में दिव्यम .. कि हे अर्जुन मेरा जन्म और कर्म दिव्य हैं और जो इस बात को जानता है वह फिर कभी इस मृत्युलोक में वापस नहीं आता है जो कि सभी प्रकार के कष्टों से भरा पड़ा है।  इसी प्रकार भगवान वराह श्रीमद भागवतम के तृतीय स्कन्द के १३ वें अध्याय में इसका वर्णन आता है जब एक शूकर के रूप में प्रकट हुए तब भी उनकी दिव्यता उसी प्रकार बनी रही वैसे शूकर इस संसार का सबसे निकृष्ट प्राणी माना जाता है पर भगवान् जब उस अवतार में आये तो जन लोक , तप लोक तथा सत लोक तीनो लोकों के प्राणी भगवान् को नमस्कार कर उनकी स्तुति करने लगे।  उन्हें पूर्ण विश्वास हो गया की यह कोई साधारण शूकर नहीं क्योंकि उनका तेज पूरे ब्रह्माण्ड में देदीप्यमान कर रहा था, वेदो की स्तुतियों को सुनने के बाद भगवान् वराह गर्भोदक सागर से निकलकर अपने बालो को इस प्रकार झटकते हैं कि सभी तीनों लोको के निवासियों उनके इस जल से तृप्त हो जाते हैं।  भगवान् के इस बाल के अग्र भाग का जल अथवा भगवान् के अगूंठे से निकली गंगा का जल में कोई अंतर् नहीं है।  भगवान् सभी को अपना दर्...

गुरु के बिना संसार सागर से पार होना मुश्किल ही नहीं नामुनकिन है

श्रीमद भागवतम के प्रथम स्कन्द में वर्णन आता है कि किस प्रकार जब महर्षि व्यासदेव चिंतित बैठे थे तब देवर्षि नारद जी वहां आते हैं और उनका मार्गदर्शन करते हैं। ठीक उसी प्रकार इस संसार में चाहे कोई कितना भी बुद्धिमान क्यों न हो पर उसकी बुद्धि कहीं न कहीं जाकर भ्रमित हो जाती है और तब हमें गुरु की आवश्यकता होती है।  इस जगत के लिए भगवान् श्री कृष्ण ने दो प्रकार के भागवत दिए एक ग्रन्थ के रूप में दूसरा गुरु के रूप में , पर दोनों एक सामान हैं यदि हम गुरु की शरण को ग्रहण करते हैं तो निश्चित रूप से हमारी बुद्धि तीक्ष्ण हो जाती है और हम वैदिक साहित्य को यथा रूप समझ सकते हैं । संसार का हर जीव अपने मन, इन्द्रियों तथा अपनी मिथ्या अहंकार से पीड़ित है, इन्द्रियों और मन के अनियत्रण के कारण वे समझ नहीं पाते कि वे किस तरह कुमार्ग पर चल रहे हैं।  इन्द्रियां इतनी प्रबल होती हैं की आप चाहे कुछ भी कर ले आपके वश में होने वाली नहीं इसलिए जब हम अपनी इन्द्रियों से गुरु को सेवा प्रदान करते हैं तो वे स्वयम नियंत्रित हो जाती हैं ।  आज हमारा परम सौभाग्य है कि हम हमारे गुरुदेव परम पूज्य श्री गोपाल कृष्ण गोस...

अजन्मा का जन्म - श्री कृष्ण जनमोत्सव

कृष्ण का जन्म और कर्म देखने में साधारण जीवों जैसा प्रतीत होता है पर वह दिव्य है और जो केवल इस सिद्धांत को समझ जाता है की कैसे कृष्ण और एक साधारण जीव के जन्म में अंतर् है असली में वह कृष्ण जन्मोत्सव अर्थात अजन्मा के जन्म के वास्तविक उद्देश्य को समझ सकता है अन्यथा वे केवल एक त्यौहार के रूप में इसे मानते हैं।  भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से इस बात की पुष्टि करते हैं श्रीमद भगवद्गीता के अध्याय ४ के ९वें श्लोक में : जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः । त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥ ९ ॥ हे अर्जुन, जो भी मेरे जन्म और कर्म की दिव्यता को समझ लेता है शरीर त्यागने के पश्चात वह पुनः इस भौतिक संसार में लौट कर नहीं आता अपितु वह मेरे शाश्वत धाम को प्राप्त होता है।  इस दिव्यता को समझने के लिए हमें भगवान् के निजी पार्षद अर्थात उनके माता-पिता के रूप वसुदेव और देवकी के स्वभाव को समझना होगा जिन्होंने भगवान् श्री कृष्ण को अपने हृदय में विराजमान किया।  वसुदेव जी के पास १८ पत्नियां थी पर भगवान् ने माता देवकी के गर्भ से अपने प्राकट्य को स्वीकार किया। वसुदेव और देवकी ने अपन...

शिवजी का प्राकट्य

प्रायः ऐसा देखा जाता है जब दो लोग आपस में इस बात को लेकर झगड़ते हैं की शिवजी बड़े हैं के विष्णु जी बड़े हैं? और बड़े आश्चर्य की बात यह  है की दोनो को भी नहीं पता होता है कि वास्तविकता क्या है। जब भगवान श्री कृष्ण ने 3 विष्णु (कर्णोकदशायी, गर्भोदशायी, क्षीरोकदशायी) की उत्पत्ति की और उसके पश्चात कर्णोकदशायी विष्णु के द्वारा ब्रह्मंड के प्रथम जीव ब्रह्मा जी की उत्पत्ति की और उन्हें सृष्टि को सृजित करने का कार्य सौपा तो सर्वप्रथम उन्होंने चार कुमार (सनक, सनातन, सनन्दन और सनत कुमार) की उतपन्न कर उन्हें सृष्टि को आगे बढ़ाने का कार्य सौपा पर ये चार कुमार जन्म से ही ब्रहमचर्य की इच्छा को प्रकट कर और भगवान् विष्णु के प्रति अपने मन को आकर्षित देख अपने पिता ब्रह्मा जी को मना कर देते हैं।  ब्रह्मा जी यह सुनकर अत्यंत क्रोधित हो जाते हैं और इस प्रकार उनके क्रोध से भौहो के द्वारा एक ऐसे बालक का जन्म होता हैं जो स्वयं ब्रह्मा जी से अपने बारे में पूछता है और फिर ब्रह्मा जी उनको अलग-अलग १२ रुद्रों के नाम बताते हैं और उनका नामकरण शिव जी के रूप में करते हैं।  रूद्र का अर्थ रुदन या क्रोध ...

चारों युगों तथा देवताओं की आयु का वर्णन

जहाँ तक मनुष्य इस भ्रम में रहता है कि वह सबसे सुखी और वैभव में जी रहा है, और शायद वह हमेशा ऐसा ही रहेगा, लेकिन हमारे शास्त्र हमें चेतावनी देते हैं कि हम भ्रम में न रहें। ब्रह्मा जी के सबसे ऊपर वाले ग्रह से लेकर सबसे निचले ग्रह तक सभी जीवों की अपनी-अपनी उम्र होती है और उन्हें निश्चित रूप से मृत्यु का सामना करना पड़ता है, आप इससे बच नहीं सकते। अंतर केवल इतना है कि समय अवधि कम या अधिक हो सकती है लेकिन इस भौतिक दुनिया में कोई भी शाश्वत नहीं है। श्रीमद्भागवतम् न केवल एक आध्यात्मिक ग्रंथ है बल्कि भौतिक संसार के बारे में भी हमे ज्ञान देता है जिसमें विज्ञान भी अभी बहुत पीछे है। अगर हम स्वर्ग जैसे अन्य ग्रहों की अवधि के बारे में बात करते हैं तो विज्ञान के पास कोई जवाब नहीं है कि वहां जीवन कैसा है और वहां देवताओं की अवधि क्या है। परन्तु श्रीमद्भागवतम् सर्ग 3.11.19 में इसके बारे में पूरी जानकारी देता है। चत्वारि त्रीणि द्वै चैकं कृतादिषु यथाक्रमम् । संख्यातानि सहस्राणि द्विगुणानि शतानि च ॥  3.11.19  ॥ देवताओं का एक वर्ष मनुष्य के 360 वर्ष के बराबर होता है।  इसलिए सतयुग की अवधि 4,800...

श्रीमद् भागवतम सभी पुराणों में श्रेष्ठ क्यों ?

जब महर्षि वेद व्यास जी सभी पुराणों एवं वेदों के संकलन के पश्चात सरस्वती नदी के तट पर अप्रसन्न मुद्रा में बैठे थे तभी देवर्षि नारद जी का आगमन होता हैं।  नारद जी ने पुछा," हे मुनियों में श्रेष्ठ आप ने तो सभी जीवो के कल्याण हेतु कितने सारे ग्रंथो की रचना की आप महान है फिर इस प्रकार की उदासी क्यों?" वेद व्यास जी ने कहा, "हे देवर्षि आप तो त्रिकाल दर्शी है आप  सभी जीवों के अंतकरण की बातों को जाने वाले हैं, फिर आप मेरी चिंता का कारण क्यों पुछ रहे हैं?" नारद जी मस्कराते हुए वेदव्यास जी को समझाते हैं ,की आपके जितने सारे ग्रंथो की रचना की वह सभी कर्मकांडो से युक्त हैं, जिसके कारण जीव केवल अपने भोग की प्राप्ति के लिए उस अंश को ग्रहण करता है और भगवद्प्राप्ति के लिए जो आपका मुख्य हेतु है  बिलकुल प्रयास नहीं करते।  अब आप श्रीमद्भागवतम की रचना किजिये जो केवल आध्यात्मिक उन्नति के लिए हैं और यदि जीव इस ग्रंथ को अपने जीवन में स्वीकार करता है  तो वह निश्चय रूप से संसार के असली दुखो से मुक्त हो जाएगा जो जन्म, मृत्यु, जरा और व्याधि के रूप में है।  क्योंकि यह एक ऐसे फल...

भगवान द्वारा ब्रह्माजी को चतुःश्लोकी भागवत का ज्ञान

वैसे तो श्रीमदभागवतम में कुल मिलाकर बारह स्कन्द एवं अठारह हजार श्लोक हैं और हर एक स्कन्द में भगवान् श्री कृष्ण एवं उनके भक्तो और साथ ही साथ सृष्टि के प्राकट्य, जीवों की उत्पत्ति एवं भौतिक प्रकति उसका प्रलय एवं भगवान् एवं उनके नित्य धाम का वर्णन हमें प्राप्त होता है। पर इसी ज्ञान को भगवान् श्री कृष्ण ने सृष्टि के प्रारम्भ में ब्रह्मा जी को केवल मात्र चार श्लोकों में वर्णित किया। इसका वर्णन हमें श्रीमद् भागवतम के दूसरे स्कन्द के ९वें अध्याय २.९.३३ से २.९.३६ श्लोक तक प्राप्त होता है।  इसी चार श्लोकों में ब्रह्मा जी को सम्पूर्ण अठारह हजार श्लोकों के ज्ञान प्राप्त हुए।  इस से हम समझ सकते हैं की ब्रह्मा जी कोई साधारण जीव नहीं है अपितु वे सृष्टि के सबसे प्रथम जीव हैं जिन्हे भगवान् श्री कृष्ण ने सृष्टि की सृजन का कार्य सौपा।  ब्रह्मा जी भौतिक दृष्टिकोण से तो उच्च पद पर आसीन है ही उसके पश्चात वे अध्यातिक स्तर पर भी भगवान् के शुद्ध भक्त है।  ब्रह्मा जी भगवान् श्री कृष्ण से सभी भौतिक शक्तियों को प्राप्त करके सृष्टि का सृजन करते हैं।  वास्तव में भगवान् पहले से ही सृष्ट...

श्रीमद्भागवत का परिचय

श्रीमद्भागवतम को भागवत पुराण के रूप में भी जाना जाता है, जिसे भगवान कृष्ण को प्राप्त करने के लिए सबसे पवित्र और सर्वोच्च आध्यात्मिक ग्रंथ माना गया है।  श्रीमद्भागवतम कोई और नहीं बल्कि स्वयं भगवान कृष्ण हैं, यह भगवान कृष्ण का साहित्य रूप है । जब भगवान कृष्ण इस ग्रह को छोड़ने वाले थे तो वे  द्वापर युग के अंत में अपने आप को श्रीमद भागवतम के रूप में परिणीत हुए। इतने सारे शास्त्रों यानि 4 वेदों, 18 पुराणों, 108 उपनिषदों और महाभारत के महान ऋषि व्यासदेव की रचना करने के बाद भी वे खुश और संतुष्ट नहीं थे क्योंकि लोग वेदों से अपने स्वयं के लाभों का हिस्सा ले रहे थे और कोई भी इसे आध्यात्मिक रूप से विकसित करने के लिए नहीं ले रहा था। जब नारद मुनि प्रकट हुए और ऋषि व्यासदेव से पूछा कि आप दुखी क्यों हैं क्योंकि आपने इतने शास्त्रों की रचना की है तो आपको खुश होना चाहिए? और फिर व्यासदेव ने अपने अप्रसन्न होने का कारण बताया। नारद मुनि ने व्यासदेव को शुद्ध आध्यात्मिक शास्त्र की रचना करने के लिए कहा, जहां कोई भौतिक इच्छाएं नहीं होनी चाहिए, बल्कि केवल भगवान कृष्ण के अतीत के समय और ...