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अहंकार वश किसी का अपमान अर्थात स्वयं का विनाश

 प्रायः जब हम पद, प्रतिष्ठा एवं धन के मद में होते हैं तब सामने व्यक्ति की अवस्था को निम्न समझकर उसे उसकी छोटी सी गलती को लेकर उसका अपमान कर देते हैं, ऐसा इसलिए क्योंकि उस व्यक्ति के पास उतनी सामर्थ्य है की वह स्वयं को ही सबसे श्रेष्ठ समझता है। पर शायद हम यह भूल जाते हैं कि भगवान् श्री कृष्ण हमें गहना कर्मणों गति भगवद गीता ४.७ में बताते हैं कि हे अर्जुन!, कर्म की गति को समझना बहुत ही कठिन है इससे विद्वान से विद्वान लोग भी भ्रमित हो जाते हैं, पर तुम केवल अपने नियत कर्म को शास्त्र युक्त पूर्ण करने का प्रयास करो और निष्काम भाव से उसे  मुझे समर्पित करो इससे तुम कर्म बंधन से बच जाओगे।  जो व्यक्ति जैसे कर्म करता है उसे आज नहीं तो कल परिणामस्वरूप उसका फल भुगतना पड़ता है।  श्रीमदभागवतम के ४थे स्कन्द के २रे अध्याय में जब दक्ष प्रजापति ब्रह्मा जी द्वारा आयोजित यज्ञ में प्रवेश करते हैं और सभी श्रेष्ठ जन  उठकर उनका विनम्रता पूर्वक उनका स्वागत करते हैं, पर जैसे ही उनकी नजर शिवजी पर पड़ती है तो उन्हें बैठे हुए शिवजी पर क्रोध आता है।  वे शिवजी के ऊपर ईर्ष्या एवं क्रोध वश भरी...