कृष्ण का जन्म और कर्म देखने में साधारण जीवों जैसा प्रतीत होता है पर वह दिव्य है और जो केवल इस सिद्धांत को समझ जाता है की कैसे कृष्ण और एक साधारण जीव के जन्म में अंतर् है असली में वह कृष्ण जन्मोत्सव अर्थात अजन्मा के जन्म के वास्तविक उद्देश्य को समझ सकता है अन्यथा वे केवल एक त्यौहार के रूप में इसे मानते हैं। भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से इस बात की पुष्टि करते हैं श्रीमद भगवद्गीता के अध्याय ४ के ९वें श्लोक में : जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः । त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥ ९ ॥ हे अर्जुन, जो भी मेरे जन्म और कर्म की दिव्यता को समझ लेता है शरीर त्यागने के पश्चात वह पुनः इस भौतिक संसार में लौट कर नहीं आता अपितु वह मेरे शाश्वत धाम को प्राप्त होता है। इस दिव्यता को समझने के लिए हमें भगवान् के निजी पार्षद अर्थात उनके माता-पिता के रूप वसुदेव और देवकी के स्वभाव को समझना होगा जिन्होंने भगवान् श्री कृष्ण को अपने हृदय में विराजमान किया। वसुदेव जी के पास १८ पत्नियां थी पर भगवान् ने माता देवकी के गर्भ से अपने प्राकट्य को स्वीकार किया। वसुदेव और देवकी ने अपन...