श्रीमद भागवतम हमें आगाह करता है कि हमें केवल उतनी ही भौतिक वस्तुओं का संग्रह करना चाहिए जितने से हमारे शरीर और आत्मा का विकास हो सके, अनावश्यक रूप से परिग्रह करना जिसकी भविष्य में शायद आवश्यकता ही न पड़े कोरी मूर्खता है। यदि हम केवल दिन - रात अपने शारीरिक सुख के लिए लगे हैं और सोचते हैं की हम आज कम सुखी है पर कल अवश्य पूर्ण रूप से सुखी हो जायेंगे तो यह केवल एक भ्रम है। हम सोचते है जो हमारे पास है वो पर्याप्त नहीं है थोड़ी कमी है यदि वह मिल जाये तो कितना अच्छा ! पर क्या उसके मिलने के बाद भी हमारी ख़ुशी ज्यादा देर तक रूकती है, जी नहीं। इसी को शास्त्रों में माया कहा गया है अर्थात वह वो नहीं है जिसको आप ढूंढ रहे हैं। पूरा जीवन हमने केवल झूठी सामाजिक प्रतिष्ठा, दिखावा, झूठ, कपट और मलिनता को लेकर लोंगो के साथ व्यव्हार करते रहे, हर जगह हमने फायदे का ही सौदा किया पर अंत समय में हमें क्या मिला? रोग, मानसिक तनाव, ईर्ष्या, अकेलापन और अशांति यह हमारे किये गए कर्मो का परिणाम होगा और साथ ही साथ जब हम अपना शरीर छोड़ेगे तब एक नया शरीर जोकि हमारे कर्मो पर ...