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Showing posts from September, 2022

अनुलोम और विलोम विवाह क्या है ?

हमारे वैदिक ग्रंथो में हर वस्तु को बड़ी ही स्पष्टता के साथ बताया गया है, यदि हम गहराई से इन शास्त्रों को देखते हैं तो हम संसार की हर वस्तुओं को ठीक - ठीक समझ पाने में सक्षम होंगे।  श्रीमद भागवतम के तीसरे स्कन्द के २२वे अध्याय में स्वम्भू मनु और कर्दम मुनि के संवाद का बहुत ही सुंदर वर्णन मिलता है,  कैसे स्वम्भू मनु अपनी पुत्री देवहुति के विवाह का प्रस्ताव लेकर कर्दम मुनि के पास जाते हैं।  कर्दम मुनि हजारों वर्षों की तपस्या से जिन्होंने भगवान् श्री विष्णु का दर्शन किया निराहार होने के कारण उनका शरीर जीर्ण लग रहा था वस्त्र गंदे हो चुके थे परन्तु उनका तेज उगते सूर्य की भांति चमक रहा था।  कर्दम मुनि के पास न तो कोई धन था, न ही कोई महल पर उसके बावजूद भी विश्व के चक्रवर्ती सम्राट स्वम्भू मनु अपने पुत्री के लिए उन्हें चुन रहे थे क्योंकि वे जानते हैं की उनकी पुत्री के लिए कोई धनवान, ऐश्वर्यवान पति नहीं अपितु सामान गुण वाले चरित्रवान, ज्ञानवान, तपस्वी भगवान् का भक्त चाहिए जो गृहस्थ में रहकर भी घर को आश्रम जैसा पवित्र बनाये।  जैसा की आज के समाज में बिल्कुल इसके विपरीत दर्शन...

जीवन की सच्चाई

श्रीमद भागवतम हमें आगाह करता है कि हमें केवल उतनी ही भौतिक वस्तुओं का संग्रह करना चाहिए जितने से हमारे शरीर और आत्मा का विकास हो सके, अनावश्यक रूप से परिग्रह करना जिसकी भविष्य में शायद आवश्यकता ही न पड़े कोरी मूर्खता है।  यदि हम केवल दिन - रात अपने शारीरिक सुख के लिए लगे हैं और सोचते हैं की हम आज कम सुखी है पर कल अवश्य पूर्ण रूप से सुखी हो जायेंगे तो यह केवल एक भ्रम है।  हम सोचते है जो हमारे पास है वो पर्याप्त नहीं है थोड़ी कमी है यदि वह मिल जाये तो कितना अच्छा ! पर क्या उसके मिलने के बाद भी हमारी ख़ुशी ज्यादा देर तक रूकती है, जी नहीं।  इसी को शास्त्रों में माया कहा गया है अर्थात वह वो नहीं है जिसको आप ढूंढ रहे हैं।  पूरा जीवन हमने केवल झूठी सामाजिक प्रतिष्ठा, दिखावा, झूठ,  कपट और मलिनता को लेकर लोंगो के साथ व्यव्हार करते रहे, हर जगह हमने फायदे का ही सौदा किया पर अंत समय में हमें क्या मिला?  रोग, मानसिक तनाव, ईर्ष्या, अकेलापन और अशांति यह हमारे किये गए कर्मो का परिणाम होगा और साथ ही साथ जब हम अपना  शरीर छोड़ेगे तब एक नया शरीर जोकि हमारे कर्मो पर ...

पितृ पक्ष क्या और क्यों ?

पितृ पक्ष को लेकर बहुत सारी भ्रांतिया लोंगो में पायी जाती है, कई बार लोग इस बात को लेकर भयभीत हो जाते हैं तो कई बार लोग इसे अनदेखा कर देते हैं की यह मात्र अन्धविश्वास है और कुछ भी नहीं।  पर हमारा वैदिक् शास्त्र हर वस्तु को प्रमाणिकता के साथ सत्यापित करता है कोई भावुकता से नहीं।  पितृ पक्ष में श्राद्ध करना अर्थात पितरों को भोजन प्रदान करना जो की भगवान् विष्णु के यज्ञ के माध्यम द्वारा संपन्न किया जाता है और यह केवल वर्ष में एक बार ही किया जा सकता है।  श्राद्ध वेदों के अनुयायियों द्वारा मनाया जाने वाला एक कर्मकांड है। यह पन्द्रह दिनों का एक वार्षिक अवसर होता है जब कर्मकांड  के द्वारा दिवंगत आत्माओं को आहुति देने के सिद्धांत का पालन किया जाता हैं।  इस प्रकार वे अपने  पूर्वज, जिनके पास  अभी  भौतिक भोग के लिए स्थूल शरीर नहीं मिला है और वे पितृलोक में है , वे अपने वंशजों द्वारा श्राद्ध की क्रिया से फिर से  नया शरीर प्राप्त कर सकते हैं।  श्राद्ध भारत में अभी भी मौजूद है, विशेष रूप से गया में, जहां एक प्रसिद्ध मंदिर जहाँ भगवान्  विष्णु के चर...

धर्म और अधर्म की शिक्षा !

धृतराष्ट्र की प्रसन्नता की कोई सीमा नहीं जब उसे इस बात का पता चला की उसके सारे १०० पुत्र और उसमें भी ज्येष्ठ दुर्योधन अत्यंत शक्तिशाली और कूटनीतिज्ञ हो गए हैं और अब वे राज्य के उत्तरदायित्य के लिए सर्वथा उपयुक्त हैं।  इससे धृतराष्ट्र  की मानसिकता का पता चलता है की धृतराष्ट्र न केवल भौतिक दृश्टिकोण से अँधा अपितु वैचारिक रूप से भी अँधा था उसे यह पता होते हुए भी कि उसके सारे पुत्र अधर्म और अनैतिकता के रास्ते पर चल रहे हैं फिर भी वह प्रसन्न है केवल इस बात से की अब राज्य का अधिकारी हमारा पुत्र दुर्योधन होगा न की पाण्डु के पुत्र युधिष्ठिर।  वह इस बात से भी आस्वस्त था की  यदि पांडव कदाचित हमारे पुत्रों से युद्ध भी करते हैं तो वे जीत नहीं पायंगे क्योंकि हमारे पुत्रों की संख्या उनसे कई गुना ज्यादा है।  धृतराष्ट्र  कभी भी दुर्योधन और अन्य पुत्रों को धर्म की शिक्षा न देकर केवल भौतिक शक्ति को बढाने की शिक्षा देता रहा और वही दूसरी तरफ पांच पांडवों की माता कुंती जो अपने पुत्रों को केवल धर्म की शिक्षा देती रहीं।  दुर्योधन बड़ा होने पर अपनी कूटनीति के कारण पांडवों को र...

ब्रह्माण्ड के प्रथम दो महान शक्तिशाली दैत्य

हमारी भौतिक प्रगति मात्र एक छलावा है , आज संसार का हर व्यक्ति अपने  आपको शक्तिशाली, सुंदर, धनवान और वैभवशाली बनाने में जुटा है। पर हम वास्तव में अपने आपको कितना भी शक्तिशाली बना ले भगवान् के सामने हमारी शक्ति नगण्य है।  श्रीमद भागवतम के तीसरे स्कन्द के सत्रहवें अध्याय में दिति के दो महान शक्तिशाली असुर पुत्र हिरण्यकश्यपु और हिरण्याक्ष का वर्णन आता है कि इन दोनों असुरों का शरीर इस्पात की तरह मजबूत, पहाड़ की तरह ऊंचा और जब वे खड़े होते तो ऐसा प्रतीत होता कि सूर्य उनकी कमर से ढक गया है।  जब हिरण्याक्ष चलता तब पृथ्वी में कम्पन्न होता और उसके बलिष्ठ भुजााओं के सामने स्वर्ग के देवराज इंद्र भी भयभीत होकर छुप जाते।  पर इन दोनों के आतंक से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में हाहकार मचा हुआ था और सभी देवतागण अत्यंत दुखी थे और उनके निवारण के लिए ब्रह्माजी के पास गए, ब्रह्माजी उन्हें सांत्वना देते है कि चिंता की कोई आवश्यकता नहीं भगवान् अपने वाराह और नरसिम्ह रूप में इन दोनों महान दैत्यों का वध करेंगे और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में शांति की व्यवस्था करेंगे।  ठीक इसी प्रकार आज के युग में भी कु...

शिक्षक दिवस की ढेर सारी शुभकामनाएँ !

ऐसा कहा जाता है, शिक्षण ही एक ऐसा पेशा है जो अन्य सभी  पेशों का निर्माण करता है वह एक शिक्षक ही है जो हमारे भिन्न - भिन्न वर्ग के अन्य अधिकारीयों को तैयार करता है।  शिक्षक होना कोई साधारण कार्य नहीं अपितु सबसे बड़ी जिम्मेदारी का कार्य है , हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि एक वयक्ति को राजा , पिता और शिक्षक तब तक नहीं बनना चाहिए जब तक वह अपने आधीन का उद्धार न कर सके।  श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं, एक शिक्षक अथवा गुरु के अंदर निम्न गुण अवश्य होने चाहिए अन्यथा वह शिक्षक होने योग्य नहीं है; वाचो वेगं मनसः क्रोध-वेगं, जिह्वा वेगं उदरोपस्थ वेगं।  जो अपने वाणी के वेग को, मन के वेग को, क्रोध के वेग को, जिह्वा के वेग को , उदर के वेग को तथा जननांगो के वेग को सहन कर सकता है वही इस संसार में शिक्षक बनने योग्य है।  भगवान् श्री कृष्ण भी भगवत गीता में कहते हैं,  जैसा कोई श्रेष्ठ व्यक्ति आचरण करता है उसी को प्रमाणित मानकर उनके अनुयाई भी वैसा करते हैं  यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः । स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥ 3. 2 1 ॥ महापुरुष जो भी कर्म करते हैं, सामा...

सर्वाकर्षक श्री कृष्ण पर उनको भी आकर्षित करती श्रीमती राधारानी

श्री कृष्ण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान और सभी आध्यात्मिक और भौतिक जगत के स्रोत कहे जाते हैं। श्री कृष्ण की दो शक्तियाँ मुख्यतया आध्यात्मिक तथा भौतिक जगत के लिए कार्य करती हैं; भौतिक जगत बहिरंगा शक्ति द्वारा तथा आध्यात्मिक जगत अन्तरंगा शक्ति द्वारा संचालित होता है।  जैसा की श्रीमदभागवतम में कहा गया है कि यह भौतिक जगत आध्यात्मिक जगत का एक चौथाई भाग है इसका अर्थ है कि आध्यात्मिक जगत भौतिक जगत से ज्यादा विस्तारित है और इसलिए भौतिक जगत से ज्यादा जिम्मेदारी आध्यात्मिक जगत की है और वह जिम्मेदारी श्रीमती राधारानी अपने ऊपर लेती है।  श्रीमती राधारानी केवल और केवल भगवान् श्री कृष्ण की सेवा में रहती है और उनका कोई अन्य कार्य नहीं है, और जो कुछ भी भक्ति हम श्री कृष्ण के लिए कर पा रहें है वह केवल और केवल एकमात्र राधारानी की क़ृपा है।  वैसे भगवान् करोडो कामदेवों को मात देते हैं पर श्रीमती राधारानी अपनी मधुर मुस्कान से उनको मात दे देती हैं।  श्रीमती राधारानी कोई और नहीं अपितु भगवान् की ही शक्ति स्वरूपा है और वे महाराज वृषभान और माता कृतिदा की पुत्री रूप में रावल में उन्हें प्राप्त हुई। स्...