एक कहावत है जिसने अपने जीवन के लक्ष्य को नहीं समझा उसने अपने जीवन को ही नहीं समझा, लक्ष्य विहिन जीवन पशु तुल्य होता है और उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है एक लक्ष्य पर बने रहना। भगवान श्री कृष्ण भगवद गीता के दूसरे अध्याय के ४१ वें श्लोक में बताते हैं, व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरूनन्दन । बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥ 2.41 ॥ जो लोग इस मार्ग पर हैं वे उद्देश्य में दृढ़ हैं, और उनका लक्ष्य एक है। हे कौरवों के प्रिय पुत्र, जो लोग दृढ़ नहीं हैं उनकी बुद्धि अनेक शाखाओं वाली होती है। यदि व्यक्ति सही तरीके से अपने लक्ष्य के प्रति गंभीर हो और सही मार्गदर्शन में आगे बढ़ता रहे तो वह अपनी रास्तों में आने वाले छोटी -छोटी बांधाओं के प्रति इतना गंभीर नहीं रहता, यहाँ तक वह अपनी मुलभुत आवश्यकताओं जैसे आहार, निद्रा, भय और मैथुन जैसे कार्यों से भी विचलित नहीं होता। एक बार जब गुरु द्रोणाचार्य ने अपने सभी शिष्यों से एक पेड़ पर बैठी चिड़िया की आँख में निशाना लगाने के लिए कहा तब सभी शिष्यों से उन्होंने बारी - बारी से पूछा। दुर्योधन ने पेड़ और उस पर बैठी चिड़िया के बारे में बताया, महाराज ...