श्रीमद भगवदगीता में जैसा भगवान् श्री कृष्ण स्वयं घोषणा करते हैं कि, जब भी अधर्म बढ़ने लगता और धर्म का क्षय होने लगता हैं तब वे स्वयं साधु पुरुषों की रक्षा करने, दुष्टों का विनाश करने और फिर से धर्म की स्थापना करने इस पृथ्वी पर प्रकट होते हैं। भगवान् ऐसे अनेको बार तथा अनेको रूपों में प्रकट हुए हैं यथा, वामन, नरसिंह, वराह, मत्स्य, कूर्म और उनको किसी सांसारिक जीव की भांति अपने पूर्व कर्मों के कारण किसी माता के गर्भ में आना नहीं होता अपितु वे स्वयं अपनी इच्छा से आते हैं, इसलिए भगवान् भगवद गीता के ४. ९ में अर्जुन से कहते हैं; जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः । त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥ ४. ९ ॥ हे अर्जुन ! जो व्यक्ति मेरे जन्म एवं कर्म को दिव्य मानता है वह फिर से इस भव् रूपी संसार के चक्र से छूटकर मेरे धाम में सदा के लिए निवास करता है। भगवान् श्री राम के चरित्र से हम देखते हैं की भले ही वे एक साधारण मनुष्य की लीला कर रहे हैं पर कोई भी सांसारिक जीव ऐसा कर पाने में अक्षम है। आइये राम नवमी के इस पावन अवसर पर भगवान् श्री राम के चरित्र से कुछ ...