आवश्यकता से अधिक संचय न करना : एक भक्त को केवल उतनी ही आय के लिए काम करना होता है जितना उसके लिए नितांत आवश्यक होता है वह अनावश्यक रूप से अधिक श्रम करके धन उपार्जन नहीं करता वह अपनी आय से हमेशा संतुष्ट रहता है। अपने बल्कि वह अपने कीमती समय का सदुपयोग कृष्ण भक्ति में लगाता है जिससे उसके सारे कार्य बड़ी आसानी से सम्पूर्ण हो जाते है और वह शांत एकाग्रचित मन से भगवान् श्री कृष्ण की सेवा में सलग्न रहता है। असल में एक व्यक्ति को उसके पूर्व कर्मो के आधार पर सुख और दुःख की प्राप्ति होती है उसमें उसका इस जीवन में कोई लेना - देना नहीं होता। इस संसार में हर व्यक्ति सुख के लिए अथाह परिश्रम कर रहा है पर शायद ही किसी को उसके अपने प्रयास से सुख मिल रहा हो, ज्यादातर लोग दुःख से ही पीड़ित है। आवश्यकता से अधिक भोजन न करना : एक भक्त केवल कृष्ण को अर्पित भोजन ही ग्रहण करता है वह अनावश्यक रूप से कुछ भी खाता - पीता नहीं रहता। प्रायः ऐसा कहा जाता है, जैसा अन्न वैसा मन व्यक्ति जिस प्रकार का भोजन करता है ठीक उसी प्रकार से उसका मन, बुद्धि और विचार का निर्माण होता है। जिस व्यक्ति ने ...