जब महर्षि वेद व्यास जी सभी पुराणों एवं वेदों के संकलन के पश्चात सरस्वती नदी के तट पर अप्रसन्न मुद्रा में बैठे थे तभी देवर्षि नारद जी का आगमन होता हैं। नारद जी ने पुछा," हे मुनियों में श्रेष्ठ आप ने तो सभी जीवो के कल्याण हेतु कितने सारे ग्रंथो की रचना की आप महान है फिर इस प्रकार की उदासी क्यों?" वेद व्यास जी ने कहा, "हे देवर्षि आप तो त्रिकाल दर्शी है आप सभी जीवों के अंतकरण की बातों को जाने वाले हैं, फिर आप मेरी चिंता का कारण क्यों पुछ रहे हैं?" नारद जी मस्कराते हुए वेदव्यास जी को समझाते हैं ,की आपके जितने सारे ग्रंथो की रचना की वह सभी कर्मकांडो से युक्त हैं, जिसके कारण जीव केवल अपने भोग की प्राप्ति के लिए उस अंश को ग्रहण करता है और भगवद्प्राप्ति के लिए जो आपका मुख्य हेतु है बिलकुल प्रयास नहीं करते। अब आप श्रीमद्भागवतम की रचना किजिये जो केवल आध्यात्मिक उन्नति के लिए हैं और यदि जीव इस ग्रंथ को अपने जीवन में स्वीकार करता है तो वह निश्चय रूप से संसार के असली दुखो से मुक्त हो जाएगा जो जन्म, मृत्यु, जरा और व्याधि के रूप में है। क्योंकि यह एक ऐसे फल...