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अहंकार वश किसी का अपमान अर्थात स्वयं का विनाश

 प्रायः जब हम पद, प्रतिष्ठा एवं धन के मद में होते हैं तब सामने व्यक्ति की अवस्था को निम्न समझकर उसे उसकी छोटी सी गलती को लेकर उसका अपमान कर देते हैं, ऐसा इसलिए क्योंकि उस व्यक्ति के पास उतनी सामर्थ्य है की वह स्वयं को ही सबसे श्रेष्ठ समझता है।

पर शायद हम यह भूल जाते हैं कि भगवान् श्री कृष्ण हमें गहना कर्मणों गति भगवद गीता ४.७ में बताते हैं कि हे अर्जुन!, कर्म की गति को समझना बहुत ही कठिन है इससे विद्वान से विद्वान लोग भी भ्रमित हो जाते हैं, पर तुम केवल अपने नियत कर्म को शास्त्र युक्त पूर्ण करने का प्रयास करो और निष्काम भाव से उसे  मुझे समर्पित करो इससे तुम कर्म बंधन से बच जाओगे। 

जो व्यक्ति जैसे कर्म करता है उसे आज नहीं तो कल परिणामस्वरूप उसका फल भुगतना पड़ता है। 

श्रीमदभागवतम के ४थे स्कन्द के २रे अध्याय में जब दक्ष प्रजापति ब्रह्मा जी द्वारा आयोजित यज्ञ में प्रवेश करते हैं और सभी श्रेष्ठ जन  उठकर उनका विनम्रता पूर्वक उनका स्वागत करते हैं, पर जैसे ही उनकी नजर शिवजी पर पड़ती है तो उन्हें बैठे हुए शिवजी पर क्रोध आता है। 

वे शिवजी के ऊपर ईर्ष्या एवं क्रोध वश भरी सभा में उनका अपमान कर देते हैं, पर शिवजी तो समाधी में बैठे भगवान् श्री विष्णु का ध्यान कर रहे हैं।

शिवजी को भला - बुरा कहने के पश्चात दक्ष प्रजापति अहंकार वश सभा छोड़कर चले जाते और उसके पश्चात शिवजी के गण और वहां ब्राहम्णो में एक दूसरे को शाप देने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है पर शिवजी इन सभी से खिन्न होकर सभा छोड़कर चले जाते हैं। 

वास्तव में शिवजी इतने शक्तिशाली हैं कि वे चाहते तो उसी क्षण दक्ष की दृष्टता का बदला ले सकते थे पर दक्ष ने उनके मौन को उनकी कमजोरी समझ लिया। 

पर जब दक्ष प्रजापति माता सती के सामने शिवजी की भत्स्रना करते हैं तब माता सती अपने शरीर को योगाग्नि द्वारा भष्म कर देती हैं। 

इसके पश्चात शिवजी के गण दक्ष प्रजापति का वध कर उनके यज्ञशाला का विध्वंश कर देते हैं। 

अंततोगत्वा जब ब्रह्मा जी सभी देवता समेत शिवजी को शांत कर उन्हें दक्षप्रजापति को पुनर्जीवित करने का निवेदन करते हैं तब दक्ष को एक बकरे का सिर लगाकर उन्हें पुनः जीवित किया जाता है। 

दक्ष अपने सामने शिवजी को खड़ा देख उन्हें दंडवत करते हैं और अपने किये पर पछतावा करते हैं पर शिवजी के प्रति इतने घोर अपराध को सोचकर उनकी आँखों में आंसू आ जाते हैं, पर इन सब के बावजूद भी शिवजी उन्हें क्षमा कर देते हैं, इसलिए शिवजी को आशुतोष भी कहा जाता है। 

अपने अहंकार वश किसी का अपमान नहीं करना चाहिए अन्यथा वह स्वयं का विनाश कर लेता है।

एक व्यक्ति को शिवजी की भांति सदैव क्षमाशील होना चाहिए, दक्ष प्रजापति की तरह अहंकार वश किसी का अपमान नहीं करना चाहिए। 



हरे कृष्ण !

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