आवश्यकता से अधिक संचय न करना : एक भक्त को केवल उतनी ही आय के लिए काम करना होता है जितना उसके लिए नितांत आवश्यक होता है वह अनावश्यक रूप से अधिक श्रम करके धन उपार्जन नहीं करता वह अपनी आय से हमेशा संतुष्ट रहता है। अपने बल्कि वह अपने कीमती समय का सदुपयोग कृष्ण भक्ति में लगाता है जिससे उसके सारे कार्य बड़ी आसानी से सम्पूर्ण हो जाते है और वह शांत एकाग्रचित मन से भगवान् श्री कृष्ण की सेवा में सलग्न रहता है।
असल में एक व्यक्ति को उसके पूर्व कर्मो के आधार पर सुख और दुःख की प्राप्ति होती है उसमें उसका इस जीवन में कोई लेना - देना नहीं होता। इस संसार में हर व्यक्ति सुख के लिए अथाह परिश्रम कर रहा है पर शायद ही किसी को उसके अपने प्रयास से सुख मिल रहा हो, ज्यादातर लोग दुःख से ही पीड़ित है।
आवश्यकता से अधिक भोजन न करना : एक भक्त केवल कृष्ण को अर्पित भोजन ही ग्रहण करता है वह अनावश्यक रूप से कुछ भी खाता - पीता नहीं रहता। प्रायः ऐसा कहा जाता है, जैसा अन्न वैसा मन व्यक्ति जिस प्रकार का भोजन करता है ठीक उसी प्रकार से उसका मन, बुद्धि और विचार का निर्माण होता है।
जिस व्यक्ति ने अपने जिह्वा पर नियंत्रण नहीं किया उसका पतन निश्चित है , आज-कल एक फैशन हो गया है कि कहीं पर भी किसी के हाँथ का बना हुआ खा लेना पर वास्तव में एक भोजन को पकने में एक व्यक्ति की मानसिकता पक्ती है और जिस भाव से व्यक्ति भोजन पका रहा है उसी भाव का निर्माण हमारे शरीर और इन्द्रियों में होता है।
रजो एवम तमो गुनी व्यक्ति का त्याग : एक भक्त भलीभांति जानता है कि सभी जीव भगवान् श्री कृष्ण के अंश है और इस कारण वह सभी को उचित सम्मान देता है पर इसका अर्थ यह नहीं की कुत्ते को वह अपने बिस्तर में अथवा भोजन की थाली में खिलाता है। एक जीव को उसकी स्थिति के अनुसार सम्मान दिया जाता है , ठीक उसी प्रकार वह रजो तथा तमोगुणी व्यक्तियों से दूरी बनाकर रहता है।
एक भक्त सभी का मित्र होता है उसका कोई शत्रु नहीं होता पर उसको यह ज्ञान होता है कि किसके साथ कितना समय बिताना चाहिए, वह ज्यादातर समय शुद्ध भक्तों के साथ रहता है जिससे उसकी चेतना भगवान् श्री कृष्ण में लगी रहे।
एकांत में रहने का प्रयास : ज्यादातर भक्त या तो भक्तों के संग या एकांत में रहना पसंद करते हैं जिससे अनावश्यक रूप से उनकी शारीरिक ऊर्जा व्यर्थ की बातों में खर्च न हो और मन संतुलित बना रहे।
क्योंकि जहाँ भी २ से अधिक सांसारिक लोग इकठ्ठा होते है वहां अनावश्यक से रूप से फिल्म, राजनिति, खेल इत्यादि पर चर्चा होती है जिसका अंत कुछ भी नहीं होता बस केवल समय का अपव्यय। पर वही पर एक भक्त जब दूसरे भक्त से मिलता है तब केवल भगवान् श्री कृष्ण के विषय में चर्चा होती है।
यही रहस्य है एक भक्त के जीवन का जिसके कारण वे इस संसार में रहते हुए भी सदैव प्रसन्न रहते हैं। श्रील प्रभुपाद कहते हैं, एक व्यक्ति को केवल स्वस्थ जीवन की इच्छा रखते हुए भगवान् श्री कृष्ण की सेवा में लगना चाहिए इससे उसका जीवन सदैव शांत, प्रसन्न और सुखी रहेगा इसमें कोई संदेह नहीं है। जो भी व्यक्ति भगवान् के प्रवित्र नाम का जप करता है वह सदैव प्रसन्न रहता है ,
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।
हरे कृष्ण !

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