श्रीमद भागवतम हमें आगाह करता है कि हमें केवल उतनी ही भौतिक वस्तुओं का संग्रह करना चाहिए जितने से हमारे शरीर और आत्मा का विकास हो सके, अनावश्यक रूप से परिग्रह करना जिसकी भविष्य में शायद आवश्यकता ही न पड़े कोरी मूर्खता है।
यदि हम केवल दिन - रात अपने शारीरिक सुख के लिए लगे हैं और सोचते हैं की हम आज कम सुखी है पर कल अवश्य पूर्ण रूप से सुखी हो जायेंगे तो यह केवल एक भ्रम है।
हम सोचते है जो हमारे पास है वो पर्याप्त नहीं है थोड़ी कमी है यदि वह मिल जाये तो कितना अच्छा ! पर क्या उसके मिलने के बाद भी हमारी ख़ुशी ज्यादा देर तक रूकती है, जी नहीं। इसी को शास्त्रों में माया कहा गया है अर्थात वह वो नहीं है जिसको आप ढूंढ रहे हैं।
पूरा जीवन हमने केवल झूठी सामाजिक प्रतिष्ठा, दिखावा, झूठ, कपट और मलिनता को लेकर लोंगो के साथ व्यव्हार करते रहे, हर जगह हमने फायदे का ही सौदा किया पर अंत समय में हमें क्या मिला?
रोग, मानसिक तनाव, ईर्ष्या, अकेलापन और अशांति यह हमारे किये गए कर्मो का परिणाम होगा और साथ ही साथ जब हम अपना शरीर छोड़ेगे तब एक नया शरीर जोकि हमारे कर्मो पर आधारित होगा श्रीमद गीता ८. ६ के अनुसार जैसी हमारे चेतना होगी वैसा हमारा शरीर निर्धारित होगा।
यदि हमने जीवन में कोई भी ऐसा भगवत कार्य नहीं किया जिससे हमें मनुष्य शरीर मिल सके तो हमें ८४ लाख योनियों में से किसी भी शरीर को धारण करना होगा जिसमें हमारा कोई भी वश नहीं होगा एक बार हमें शरीर प्राप्त हो गया फिर हम बद्ध हैं उस शरीर के कष्टों को भोगने के लिए।
फिर उस समय न तो हमारे द्वारा इकट्ठे धन , न तो कोई रिश्तेदार, न ही कोई मित्र, न परिवार जिनके लिए हमने इतना कुछ किया वे आकर हमारा साथ देंगे पर फिर भी भगवान् इतने दयालु हैं कि हमें परमात्मा के रूप में अपना साथ देते हैं।
ऐसे परमात्मा का जिनका हमने जीवन भर कभी स्मरण नहीं किया पर फिर भी वे हमारे लिए चिंतित रहते हैं की कब वह मेरी तरफ आकर्षित होगा और निरंतर हमारा साथ देते हैं जब संसार के सभी लोग हमारा साथ छोड़ देते हैं।
इसलिए ब्रह्मा जी भगवान् से कहते हैं , हे प्रभु इस संसार में यदि किसी का कोई घनिष्ट मित्र है तो वह आप हो अन्यथा तथाकथित मित्र, परिजन, समाज सब केवल स्वार्थ के सम्बन्धो से निहित हैं।
पत्नी तब तक जबतक पति उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति करें, परिजन तब तक जबतक हम उनके स्वार्थो की पूर्ति करें, बच्चे कब तक पिता जब तक उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति करें अर्थात यह सभी रिश्ते आप से प्रेम से परिपूर्ण तब तक दिखेंगे जब तक आप उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करते रहेंगे जिस दिन आप ऐसा नहीं करते आपकी जगह उनके जीवन में कोई और होगा।
श्रीमद भागवतम में अवन्ति ब्राह्मण की कथा आती है (स्कन्द ११, अध्याय २३ ) और हमें आगाह करते हैं की कैसे धन के कारण पंद्रह अवांछित वस्तुएँ उत्पन्न होती हैं - चोरी, हिंसा, झूठ, छल, काम, क्रोध, अभिमान, ज्वर, असहमति, घृणा, अविश्वास, संघर्ष, स्त्री से लगाव, जुआ और नशा। और इन सभी को प्राप्त करके हम अपने परिवार में खुशहाल अनुभव को प्राप्त करते हैं पर वास्तव में यह ख़ुशी हमसे नहीं हमारे धन से है और इस धन को चले जाने के पश्चात यही लोग ऐसे शब्दों का प्रयोग करते हैं जो एक तीर की भांति हृदय को चीर देता है।
श्रीमद भागवतम हमें अपने जीवन की सच्चाई से आगाह करता है और जो थोड़े बुद्धिमान है वे निश्चित ही शास्त्रों की इन शिक्षाओं को ग्रहण करते हैं।
हरे कृष्ण !

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