इस भौतिक जगत में जीव उस आनंद की खोज में भटक रहा है जिसे वह कभी - कभी अनुभूति स्वरूप प्राप्त करता है पर उसकी तलाश कभी पूर्ण नहीं होती। चूँकि यह भौतिक संसार आध्यात्मिक संसार का प्रतिबिम्ब स्वरुप है इसलिए यहाँ वास्तविक सुख और आनंद कभी भी प्राप्त नहीं किया जा सकता।
यहाँ रजो और तमों गुण के कारण हर व्यक्ति ईर्ष्या और काम के वशीभूत रहता है पर बैकुंठ में शुद्ध सतोगुणी होने के कारण वहां ईर्ष्या और काम का लेश मात्र भी नहीं है।
श्रीमद भागवतम के तृतीय स्कंद के पन्द्रहवें अध्याय में वैकुण्ठ लोक का वर्णन आता है और बताया जाता है की किस प्रकार ब्रह्मा के चार कुमार पुत्र जो कि एक पांच वर्षीय बालक के रूप में विचरण करते भौतिक जगत से आध्यात्मिक लोकों में प्रवेश कर गएँ और उन्होंने वैकुण्ठ के ६ द्वारों को भी पार कर लिया पर जब वे आखिरी द्वार पर पहुंचे तो वहां खड़े दो द्वारपालों जय तथा विजय द्वारा उन्हें रोक लिया गया।
वहां सभी वस्तु चर है फिर चाहे वह पौधे, जल, पुष्प अथवा पशु हैं सभी में एक ही भावना रहती है की किस प्रकार भगवान् श्री कृष्ण की सेवा की जाय।
ऐसा बताया जाता की सभी पक्षियों में जब वे अपनी ध्वनि का कोलाहल उतपन्न करते है जैसे कि कोयल, तोता, मोर, बत्तख, और अन्य, पर जब वे देखते हैं कि भवराँ भगवान् की महिमा का गुणगान कर रहा है तो वे सभी चुप हो जाते है उनकी ऐसी भावना नहीं रहती कि भवराँ हमसे तुच्छ है।
वही भाव हमें वैकुण्ठ के पुष्पों में प्राप्त होता है जब तुलसी दल भगवान् के चरणों में अर्पित किया जाता है तब सभी उपस्थित पुष्प बेला, चम्पा, कुमुदिनी, चमेली, गुलाब तथा कमल सभी तुलसी जी को अपना सम्मान प्रकट करते हैं और उनके सौभाग्य की सराहना करते हैं।
वहां देवतागण सुंदर स्त्रियों के साथ रमण करते हैं पर उनमें काम भाव जरा भी नहीं रहता अपितु वे सदैव भगवान् के गुणगान में व्यस्त रहते है, पर भौतिक संसार में जहाँ स्त्री और पुरुष का प्रसंग आता है वहां व्यक्ति कामुक हो उठता है यही अंतर है भौतिक जगत और भगवान के विशिष्ट लोक वैकुण्ठ में।
इसीलिए हर कोई वैकुण्ठ में लोक प्रवेश नहीं कर सकता यही कारण था जिसके लिए द्वारपालों ने चारकुमारों को प्रवेश करने से वर्जित किया हालांकि वे चार कुमार भौतिक कल्मषों से सर्वथा मुक्त थे उनमें लेश मात्र भी ईर्ष्या और काम वासना नहीं थी।
इस संसार में न तो असली प्रेम है और न ही शाश्वत जीवन इसलिए भगवान् हमें ग्रंथों के माध्यम से अपने लोकों का वर्णन कर हमें एक आशा प्रदान करते हैं कि यदि हम सतोगुणी जीवन जीते हैं तो निश्चित रूप से हम वैकुण्ठ लोक के भागिदार बनेंगे।
हरे कृष्ण

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