जब महर्षि वेद व्यास जी सभी पुराणों एवं वेदों के संकलन के पश्चात सरस्वती नदी के तट पर अप्रसन्न मुद्रा में बैठे थे तभी देवर्षि नारद जी का आगमन होता हैं।
नारद जी ने पुछा," हे मुनियों में श्रेष्ठ आप ने तो सभी जीवो के कल्याण हेतु कितने सारे ग्रंथो की रचना की आप महान है फिर इस प्रकार की उदासी क्यों?"
वेद व्यास जी ने कहा, "हे देवर्षि आप तो त्रिकाल दर्शी है आप सभी जीवों के अंतकरण की बातों को जाने वाले हैं, फिर आप मेरी चिंता का कारण क्यों पुछ रहे हैं?"
नारद जी मस्कराते हुए वेदव्यास जी को समझाते हैं ,की आपके जितने सारे ग्रंथो की रचना की वह सभी कर्मकांडो से युक्त हैं, जिसके कारण जीव केवल अपने भोग की प्राप्ति के लिए उस अंश को ग्रहण करता है और भगवद्प्राप्ति के लिए जो आपका मुख्य हेतु है बिलकुल प्रयास नहीं करते।
अब आप श्रीमद्भागवतम की रचना किजिये जो केवल आध्यात्मिक उन्नति के लिए हैं और यदि जीव इस ग्रंथ को अपने जीवन में स्वीकार करता है तो वह निश्चय रूप से संसार के असली दुखो से मुक्त हो जाएगा जो जन्म, मृत्यु, जरा और व्याधि के रूप में है।
क्योंकि यह एक ऐसे फल के समान हैं जिसमें न तो छिलका है और न ही गुठली इस्मे केवल रस ही रस है, और यदि कलियुग में जीव श्रीमद भागवतम की शरण लेता है तो उसका कल्याण निश्चित है ।
श्रीमद्भागवतम सभी ग्रंथो का राजा इसलिए माना जाता है क्योंकि इसका जो विषय है वह सभी जीव के एकमात्र कल्याण के लिए के लिए है और यह महर्षि वेद व्यास की परिपक्य अवस्था में रचित है।
जो भी व्यक्ति श्रीमद्भागवतम में श्रद्धा रखकर इसका पठन या श्रवण करता हैं वह इस लोक में तथा भगवद्धाम में सभी सुखो को प्राप्त करता है।
श्रील प्रभुपाद केवल श्रीमद्भागवतम के कुछ स्कन्दो को लेकर पश्चिम में गए थे पर उस श्रीमद्भागवतम के कारण आज पुरे विश्व भर में लाखों की संख्या में भक्त और हजारों की संख्या में भगवान् श्री कृष्ण के मंदिर है।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।

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