इस भौतिक जगत में जब हम सुख भोगते रहते हैं तब हमें यह समझना चाहिए कि हमारा पुण्य क्षीण हो रहा है और जब हम कष्ट भोग रहे हैं तब हमें समझना चाहिए की हमारा पाप क्षीण हो रहा है।
इस संसार में व्यक्ति जब सुख भोगता है तब यह भूल जाता है की उसका पुण्य क्षीण हो रहा है और उसे और अधिक पुण्य की आवश्यकता होगी और इस प्रकार हम पाप और पुण्य के चक्र में सदैव पड़े रहकर सुख और दुःख भोगते रहते हैं।
पर यदि हम पाप और पुण्य कर्मों से बचना चाहते हैं तो हमें भगवान् श्री कृष्ण के चरण कमलो की शरण लेनी चाहिए ,क्योंकि भगवान् का एक नाम मुकुंद है जो हमें इस संसार से मुक्ति प्रदान कर सकते हैं।
जो व्यक्ति भगवान् श्री कृष्ण की शरण ग्रहण करता है भगवान् उसको ज्ञान प्रदान करते हैं श्रीमद भगवद गीता में १०. १० श्लोक में भगवान् कहते हैं;
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् |
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते || १०. १०||
जो निरंतर मेरी प्रेमा भक्ति में लगा रहता है उसे मैं बुद्धि प्रदान करता हूँ जिससे वह मेरी शरण में आ सके।
और ऐसा करते हुए मनुष्य ज्ञान में स्थिर रहकर भौतिक जगत में रहते हुए निम्न तीन बातों को सदैव स्मरण रखना चाहिए जिस प्रकार वह सदैव सुखी रह सके ;
१. यदि वह अपने से अधिक श्रेष्ठ व्यक्ति से मिले तो उसे हर्षित होना चाहिए न की ईर्ष्या प्रकट करनी चाहिए जैसा कि प्रायः व्यक्ति जब अपने से श्रेष्ठ व्यक्ति से मिलता है तो उसे ईर्ष्या होने लगती है जिससे वह उस व्यक्ति का सम्मान नहीं करता और इस प्रकार घोर नरक में जाता है।
२. यदि वह अपने से कम श्रेष्ठ व्यक्ति से मिले तो उसे दयावान होना चाहिए न की उसका उपहास करना चाहिए जैसा कि प्रायः व्यक्ति जब अपने से कम श्रेष्ठ व्यक्ति से मिलता है तो उसका उपहास करता है और ऐसा करके न केवल उस व्यक्ति के हृदय को दुखी करता है अपितु भगवान् के प्रति भी अपराध करता है।
३. यदि वह अपने समान व्यक्ति से मिले तो उसे मैत्री भाव प्रकट करना चाहिए न की उसके सामने अपने आप को गर्वित दिखाना चाहिए जैसा कि प्रायः व्यक्ति जब अपने समान व्यक्ति से मिलता है तो उसके सामने अपने आप को गर्वित करता है और ऐसा करके न केवल उस व्यक्ति के साथ सम्बन्धो को तोड़ता है अपितु अपने अहंकार का भी पोषण करता है।
और इन्ही कारणों से व्यक्ति सदैव कष्ट भोगता है, और यदि वह जीवन के कष्टों से छुटकारा पाना चाहता है तो उसे सदैव अपने मान की परवाह न करते हुए दूसरों को सम्मान देना चाहिए जिससे उसके पाप नष्ट हो सके और वह इस भौतिक जगत के साथ - साथ आध्यात्मिक जगत में सुखपूर्वक रह सके।
इस बात की पुष्टि श्री चैतन्य महाप्रभु जो स्वयं भगवान् श्री कृष्ण के साक्षात् अवतार है अपने ग्रन्थ श्री श्री शिक्षाष्टकम् में करते हैं।
तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सहिष्णुना।
अमानिना मानदेन कीर्तनीयः सदा हरिः ॥
स्वयं को मार्ग में पड़े हुए तृण से भी अधिक नीच मानकर, वृक्ष के समान सहनशील होकर, मिथ्या मान की कामना न करके दुसरो को सदैव मान देकर हमें सदा ही श्री हरिनाम कीर्तन विनम्र भाव से करना चाहिए
सदैव विनम्र भाव से संसार में रहते हुए भगवान् श्री कृष्ण के नाम का कीर्तन करते हुए हम सभी कष्टों से छुटकारा पा सकते हैं। और यही एकमात्र इस भवरोग की औषधी है।
हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम् ।
कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा॥
हरे कृष्ण!

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