गृहस्थ जीवन एक आश्रम हैं और यह सभी आश्रमों में श्रेष्ठ माना जाता हैं क्योंकि इस पर अन्य तीन आश्रम ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ और सन्यास निर्भर रहता है। पर यदि घर के सदस्य एक दूसरे से प्रेमपूर्वक न रहकर भगवान् को केंद्र में रखकर उनकी सेवा न करके अपनी - अपनी इन्द्रियतृप्ति में लगे हैं तब वह गृहस्थ नहीं गृहमेधि बन जाता है और उसका जीवन नर्क तुल्य हो जाता है।
आश्रम का अर्थ पवित्रता से हैं जहाँ हर व्यक्ति पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की सेवा में लगकर सुखी और सप्पन्न जीवन व्यतीत करते हैं पर यदि जिस घर में भगवान् और उनके भक्तों का सम्मान नहीं होता वहां हर व्यक्ति एक दूसरे से एक प्रकार के दुश्मन बने रहते हैं। रावण के अनुसार ऐसे दुश्मन बाहर वालों से ज्यादा खतरनाक होते हैं, रावण विभीषण के लंका से चले जाने के बाद कहता है, एक व्यक्ति को बाहर वालो से ज्यादा खतरा उसके घर वालो से रहता है। क्योंकि जब व्यक्ति स्वार्थी होता है तब वह किसी भी हद तक जा सकता है।
चाणक्य पंडित के अनुसार घर में चार प्रकार के शत्रु है।
१. अगर पिता कर्ज में है तो उसे दुश्मन माना जाता है - कहते हैं यदि पुत्र को अपने पिता के जाने के बाद उसके द्वारा लिए गए कर्ज को चुकता कर रहा है तो वह पिता उस पुत्र का शत्रु है।
२. यदि माँ ने अपने बड़े बच्चों की उपस्थिति में दूसरे पति का चयन किया है, तो उसे शत्रु माना जाता है - यदि कोई स्त्री उसके बच्चे बड़े होने के पश्चात किसी दूसरे पति का चुनाव करती है तो उसे शत्रु मानना चाहिए।
३. यदि पत्नी अपने पति के साथ अच्छी तरह से नहीं रहती है, और बहुत कठोर व्यवहार करती है, तो वह शत्रु मानी जाती है-पत्नी को धर्म पत्नी का दर्जा दिया गया है जिसे किसी भी परिस्थिति में हर प्रकार से उसके पति का सहयोग करना होता है, भले ही पति गरीब है अमीर है, स्वस्थ है या बीमार। पर यदि पत्नी ऐसा नहीं करती तो उसे दुश्मन ही मानना चाहिए।
४. और यदि पुत्र मूर्ख है, तो वह शत्रु माना जाता है- पुत्र यदि बुद्धिमान नही है तो पिता द्वारा कमाई सम्पति को भी नष्ट कर देता है और समाज में पिता को केवल अपमानित ही करता है और ऐसा पुत्र शत्रु ही होता है।
पारिवारिक जीवन में पिता, माता, पत्नी और बच्चे संपत्ति हैं, लेकिन अगर ये सब धर्म के विपरीत कार्य करते हैं तो उन्हें शत्रु ही समझना चाहिए।
हरे कृष्ण !

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