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कर्दम मुनि और माता देवहूति - एक आदर्श गृहस्थ

श्रीमद भागवतम के तीसरे स्कन्द के २०वे अध्याय में जब मैत्रेय मुनि और महाराज विदुर का संवाद होता है, तब वहां स्वम्भू मनु और कर्दम ऋषि के प्रसंग की चर्चा होती है। 

उसी चर्चा में स्वम्भू मनु के संतान अर्थात तीन पुत्रियों (आकूति, देवहुति और प्रसूति) और दो पुत्रों का वर्णन (उत्तानपाद और प्रियव्रत) का वर्णन आता है। 

स्वम्भू मनु अपनी सुंदर और सुशील पुत्री देवहुति के लिए वर ढूढ़ने निकलते हैं तभी उनकी भेंट कर्दम मुनि से होती है जो पूर्ण रूप से तपस्या में लीन रहते हैं जिसके कारण उनका शरीर दुर्बल और वस्त्र पूर्ण रूप से मैले हो गए रहते हैं। 

पर राजा स्वम्भू मनु उन्हें देखकर समझ जाते हैं कि इनसे श्रेष्ठ उनकी पुत्री के लिए कोई वर इस पृथ्वी पर नहीं होगा और इस प्रकार उन्हें अपनी पुत्री देवहुति के लिए विवाह का प्रसताव स्वीकार करने के लिए कहते हैं। 

एक आदर्श गृहस्थ जीवन का उदाहरण प्रस्तुत करने वाले  कर्दम मुनि और माता देवहूति ने सभी प्रकार के शास्त्र उक्त आचरण किये, जिनसे न केवल उनके जीवन में शांति, प्रसन्नता और सुख प्राप्त हुआ बल्कि उन्हें पुत्र के रूप में भगवान् श्री कपिल की प्राप्ति हुयी। 

एक आदर्श पत्नी के रूप में एक राज कन्या होने के पश्चात भी माता देवहुति ने सभी सुख का त्याग कर अपने पति कर्दम मुनि की सेवा करके उन्हें प्रसन्न किया, और ठीक उसी प्रकार कर्दम मुनि ने भी उन्हें हर प्रकार से सुख सुविधा प्रदान किये। 

एक गृहस्थ जीवन में पत्नी और पति को कर्दम मुनि और माता देवहूति जैसे आदर्श को अपनाना चाहिए, और पत्नी को केवल अपने सुख की नहीं वरन पति के सुख के लिए अपना सब कुछ त्याग देना चाहिए और उसी जगह एक पति को अपनी पत्नी से मीठी वाणी, उनके सुख के लिए प्रदान वस्तु, उनके पालन-पोषण की जिम्मेदारी इत्यादि के लिए हमेशा तैयार होना चाहिए।

आज के आधुनिक युग में पति और पत्नी दोनों एक बराबर बनने की स्पर्धा में लगे हैं, जिसके कारण न केवल परिवार में क्लेश अपितु बच्चों पर इसका बुरा असर हो रहा है और जब तक समाज में ऐसी धारणा बनी रहेगी कोई भी गृहस्थ सुखी नहीं रह सकता। 

हर गृहस्थ को यह समझना चाहिए की भगवान् की प्रसन्नता के लिए कार्य किये बिना कोई भी सुखी और शांतिमय जीवन नहीं व्यतीत कर सकता।


हरे कृष्ण !


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