प्रायः ऐसा कहा जाता है कि किसी भी क्षेत्र में यदि आपको कुछ सीखना है तो आपको गुरु रूप में किसी न किसी को स्वीकार करना होता है पर उनका स्तर भौतिक है, फिर यदि हम आध्यात्म की बात करें तो निश्चित रूप से हमें गुरु स्वीकार करना ही पड़ेगा।
क्योंकि बिना गुरु के हमें भौतिक ज्ञान तो एक बार कदाचित हो भी सकता है पर आध्यात्मिक ज्ञान बिलकुल संभव नहीं, इन्ही कारणों से हम देखते हैं की भगवान श्री राम एवं श्री कृष्ण ने भी गुरु को स्वीकार किया।
इतना ही नही सृष्टि के निर्माता ब्रह्माजी को भी गुरु की आवश्यकता पड़ी श्रीमद भागवतम के दूसरे स्कन्द के दूसरे अध्याय के ३३ से ३६ श्लोक में जब ब्रह्माजी भगवान श्री कृष्ण द्वारा ज्ञान प्राप्त करते हैं तब जाकर कहीं वे सृष्टि का निर्माण कार्य करते हैं।
गुरु बनाना कोई फैशन की बात नहीं बल्कि उनके प्रति पूर्ण रूप से समपर्ण होना जरुरी है, क्योंकि गुरु कोई साधारण व्यक्ति नहीं अपितु स्वयं भगवान् श्री कृष्ण के प्रतिनिधि है और पतित जीवों का उद्धार करने जो की संसार के माया में पड़े होकर त्रिविध कष्टों को भोग रहे हैं उन्हें मुक्ति दिलाने आते हैं।
ॐ अज्ञान तिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जन शलाकया । चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः ॥
मैं घोर अज्ञान के अंधकार में उत्पन्न हुआ था और मेरे गुरु ने अपने ज्ञान रूपी प्रकाश से मेरी आँखें खोल दीं। मैं उन्हें सादर नमस्कार करता हूँ।
हम इस संसार में चाहे कितने भी बुद्धिमान क्यों न हो पर कही न कही हम इस भवसागर में जरूर फंस जाते है और ऐसे में यदि कोई हमारी मदद कर सकता है तो वह केवल गुरु।
क्योंकि गुरु हमें शास्त्रों के माध्यम से वैदिक ज्ञान प्रदान करके हमें सही मार्गदर्शन करते हैं, जिससे हम जीवन में उचित रूप से शास्त्र के नियमों के अनुसार अपना जीवन जी सकें और फिर अंत में भगवद्धाम लौट सकें अन्यथा हम अज्ञानता के कारण विभिन्न प्रकार के पाप कर्मों यथा मांसाहार, जुआ, अवैध सम्बन्ध और नशे के शिकार होकर नरक गामी हो जाएंगे।
अब प्रश्न यह उठता है कि हम सही गुरु की पहचान कैसे करें, तो उसके लिए श्रील रूप गोस्वामी पाद हमें उपदेशामृत में बताते हैं, यदि कोई व्यक्ति इन छः वेगों को नियत्रित करने में सक्षम है तो वह गुरु बन सकता है ;
वाचो वेगं मनसः क्रोध वेगं जिह्वा-वेगं उदरोपस्थ-वेगं।
एतान वेगं यो विसहेता धिरः सर्वं अपिमं पृथिवीं स शिष्यत्।।
एक बुद्धिमान और संयमित व्यक्ति जो बोलने की प्रेरणा, मन की उत्तेजना, क्रोध की शुरुआत, जीभ की उग्रता, पेट की इच्छा और जननांगों की उत्तेजना को नियंत्रित कर सकता है, वह पूरी दुनिया को निर्देश दे सकता है। दूसरे शब्दों में, सभी लोग ऐसे आत्म-नियंत्रित व्यक्ति के शिष्य बन सकते हैं।
आज के इस विशेष तिथि जिसे श्री कृष्ण द्वैपायन व्यासदेव का प्राकट्य दिवस माना जाता है , उन्होंने सभी प्रकार से हमें शास्त्रों को प्रदान कर मानव जीवन को पशु बनने से बचा लिया, हम सब उनके ऋणी हैं।
आईये हम सभी मिलकर इस पावन दिवस को और पावन बनायें और अपने जीवन में अपने गुरुजनो को आभार व्यक्त कर उनको वंदन करे। क्योंकि गुरु के पास हमें विनम्रता का भाव लेकर फिर कुछ अपने विचारों को व्यक्त करना चाहिए जैसा की श्रीमद भगवद्गीता के ४. ३४ में बताते हैं।
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥ ४. ३४ ॥
एक आध्यात्मिक गुरु के पास जाकर सत्य जानने की कोशिश करो। उनसे विनम्र भाव से पूछो और उनकी सेवा करो। आत्म-साक्षात्कार प्राप्त आत्माएँ तुम्हें ज्ञान दे सकती हैं क्योंकि उन्होंने सत्य को देखा है।
हरे कृष्ण !

Comments
Post a Comment