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गुरु के बिना संसार सागर से पार होना मुश्किल ही नहीं नामुनकिन है

श्रीमद भागवतम के प्रथम स्कन्द में वर्णन आता है कि किस प्रकार जब महर्षि व्यासदेव चिंतित बैठे थे तब देवर्षि नारद जी वहां आते हैं और उनका मार्गदर्शन करते हैं। ठीक उसी प्रकार इस संसार में चाहे कोई कितना भी बुद्धिमान क्यों न हो पर उसकी बुद्धि कहीं न कहीं जाकर भ्रमित हो जाती है और तब हमें गुरु की आवश्यकता होती है। 

इस जगत के लिए भगवान् श्री कृष्ण ने दो प्रकार के भागवत दिए एक ग्रन्थ के रूप में दूसरा गुरु के रूप में , पर दोनों एक सामान हैं यदि हम गुरु की शरण को ग्रहण करते हैं तो निश्चित रूप से हमारी बुद्धि तीक्ष्ण हो जाती है और हम वैदिक साहित्य को यथा रूप समझ सकते हैं ।

संसार का हर जीव अपने मन, इन्द्रियों तथा अपनी मिथ्या अहंकार से पीड़ित है, इन्द्रियों और मन के अनियत्रण के कारण वे समझ नहीं पाते कि वे किस तरह कुमार्ग पर चल रहे हैं। 

इन्द्रियां इतनी प्रबल होती हैं की आप चाहे कुछ भी कर ले आपके वश में होने वाली नहीं इसलिए जब हम अपनी इन्द्रियों से गुरु को सेवा प्रदान करते हैं तो वे स्वयम नियंत्रित हो जाती हैं । 

आज हमारा परम सौभाग्य है कि हम हमारे गुरुदेव परम पूज्य श्री गोपाल कृष्ण गोस्वामी जी का ७८ वां व्यासपूजा मना रहें हैं। गुरुदेव के चरणों में हमारी यही प्रार्थना है की सदैव हम जैसे पतितो पर अपनी कृपा दृष्टि बनाये रखे तथा अपने एवं श्रील प्रभुपाद के चरणों में सदैव आश्रित रखें। 

गुरु महाराज न केवल प्रभुपाद के सपनो को साकर कर रहें अपितु इस उम्र में प्रभुपाद की सेवा सदैव ततपर रहते हैं फिर चाहे वह भारत में दिल्ली, मुंबई अथवा कलकत्ता हो या विदेशो में  कनाडा, टोरंटो, रसिया, मॉरीशस हो सभी जगह वे अपने शिष्यों का मार्ग दर्शन कर और हजारों - हजारों लोगो को कृष्ण भावनामृत का प्रचार -प्रसार कर रहें हैं। 

आज श्री गुरुदेव के जीवन से हम कुछ मुख्य बातों को सीख कर अपने जीवन को भी धन्य बना सकते हैं :-

१. सभी को प्रेम प्रदान करना : गुरुदेव के जीवन से हम सीख सकते हैं कि किस प्रकार वे हमें सभी से प्रेम करना सिखाते हैं और हमें यह शिक्षा देते हैं की यदि हमें दूसरों से प्रेम चाहिए तो हमें दूसरों को प्रेम प्रदान करना होगा। 

२. छोटी - छोटी वस्तुओं के प्रति जिम्मेदार : गुरुदेव हमें हर छोटी - छोटी वस्तुओं के प्रति जिम्मेदार होना सिखाते हैं क्योंकि अक्सर हमें बड़ी चीजों पर ध्यान देते हैं पर छोटी चीजों की उपेक्षा कर देते हैं जो की आगे चलकर हमारे जीवन में कई प्रकार की समस्याएं उत्पन्न करता है। 

३. श्रील प्रभुपाद के ग्रंथों का अध्ययन: गुरु महाराज हमें आदेश देते हैं कि यदि हम श्रील प्रभुपाद की पुस्तकों का नियमित अध्यन करते हैं तो हमें इस संसार में किसी भी प्रकार का कष्ट अनुभव नहीं होगा यही कारण हैं कि आज पुरे विश्व में ५० करोड़ से भी ज्यादा प्रभुपाद की भगवद गीता को स्वीकार किये हैं। 

४. सादा जीवन उच्च विचार : गुरु महाराज अपने व्यकितगत जीवन से हमें सिखाते हैं की किस प्रकार यदि हम अपने वैदिक् ग्रंथो को जीवन में स्वीकार करते हैं तो हमारा जीवन अत्यंत सरल और हमारे विचार महान बनेगे। आज पूरा विश्व इस बात को स्वीकार कर रहा है कि भौतिक वस्तुओं को एकत्रित कर कोई भी सुखी नहीं रह सकता वरन उसे ज्यादा दुःख का सामना करना पड़ सकता है। 

५. शुद्धता में शक्ति : गुरु महाराज कहते हैं यदि कोई अपने आचरण, चरित्र और व्ययवहारिक जीवन को शुद्ध कर लेता है तो वह सबसे ज्यादा शक्तिशाली व्यक्ति है और यही हमारे कृष्ण भावनामृत का मुख्य उद्देश्य है कि लोग अपने मन, इन्द्रियों और बुद्धि के द्वारा पूर्णतया शुद्ध होकर भगवान् श्री कृष्ण की सेवा में लगे और अपने जीवन को सुखी बनाये। 

साथ ही साथ हम यह प्रार्थना करते हैं की नरसिम्ह देव, श्री श्री राधा गिरिधारी, श्री श्री जगन्नाथ बलदेव सुभद्रा मैया , श्री श्री सीता राम लक्ष्मण हनुमान एवं गौर निताई उन्हें सदैव स्वस्थ एवं प्रसन्न रखें। 


हरे कृष्ण !



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