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शिवजी का प्राकट्य

प्रायः ऐसा देखा जाता है जब दो लोग आपस में इस बात को लेकर झगड़ते हैं की शिवजी बड़े हैं के विष्णु जी बड़े हैं? और बड़े आश्चर्य की बात यह  है की दोनो को भी नहीं पता होता है कि वास्तविकता क्या है।

जब भगवान श्री कृष्ण ने 3 विष्णु (कर्णोकदशायी, गर्भोदशायी, क्षीरोकदशायी) की उत्पत्ति की और उसके पश्चात कर्णोकदशायी विष्णु के द्वारा ब्रह्मंड के प्रथम जीव ब्रह्मा जी की उत्पत्ति की और उन्हें सृष्टि को सृजित करने का कार्य सौपा तो सर्वप्रथम उन्होंने चार कुमार (सनक, सनातन, सनन्दन और सनत कुमार) की उतपन्न कर उन्हें सृष्टि को आगे बढ़ाने का कार्य सौपा पर ये चार कुमार जन्म से ही ब्रहमचर्य की इच्छा को प्रकट कर और भगवान् विष्णु के प्रति अपने मन को आकर्षित देख अपने पिता ब्रह्मा जी को मना कर देते हैं। 

ब्रह्मा जी यह सुनकर अत्यंत क्रोधित हो जाते हैं और इस प्रकार उनके क्रोध से भौहो के द्वारा एक ऐसे बालक का जन्म होता हैं जो स्वयं ब्रह्मा जी से अपने बारे में पूछता है और फिर ब्रह्मा जी उनको अलग-अलग १२ रुद्रों के नाम बताते हैं और उनका नामकरण शिव जी के रूप में करते हैं। 

रूद्र का अर्थ रुदन या क्रोध होता है चूँकि शिवजी का प्राकट्य ब्रह्माजी के क्रोध से हुआ इसलिए उनका शरीर नीला तथा लाल जो की तमो तथा रजोगुण मिश्रण है। इसका वर्णन हमें श्रीमदभागवतम के तीसरे स्कन्द में प्राप्त होता है। 

मन्युर्मनुर्महिनसो महाञ्छिव ऋतध्वज: ।

उग्ररेता भव: कालो वामदेवो धृतव्रत: ॥ ३. १२.१२  ॥

भगवान ब्रह्मा ने कहा: मेरे प्यारे पुत्र रुद्र, तुम्हारे ग्यारह अन्य नाम हैं: मन्यु, मनु, महिनसा, महान, शिव, अष्टध्वज, उग्रेता, भव, काल, वामदेव और धृतव्रत ।

सृष्टि के उत्पत्ती के लिए  शिवजी ने ऐसे-ऐसे असंख्य जीवों की उत्पन्न जिससे स्वयं ब्रह्माजी भयभीत होने लगे फिर उन्होंने शिवजी को तपस्या का आदेश दिया जिससे वे आगे और अधिक सृष्टि न करें। फिर ब्रह्माजी ने उन्हें प्रलय  का कार्य सौंपा।

शिवजी महान हैं और सभी देवताओं में श्रेष्ठ हैं उनका एकमात्र कार्य भगवान् की प्रसन्नता के लिए कार्य करना।

आईए हम सभी शिवजी से प्रार्थना करें कि जिस प्रकार वे भगवान् की सेवा करके महान वैष्णव के रूप में विश्वविख्यात हैं हमे भी उनकी कृपा प्राप्त हो। 


हर हर महादेव !

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