श्री कृष्ण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान और सभी आध्यात्मिक और भौतिक जगत के स्रोत कहे जाते हैं। श्री कृष्ण की दो शक्तियाँ मुख्यतया आध्यात्मिक तथा भौतिक जगत के लिए कार्य करती हैं; भौतिक जगत बहिरंगा शक्ति द्वारा तथा आध्यात्मिक जगत अन्तरंगा शक्ति द्वारा संचालित होता है।
जैसा की श्रीमदभागवतम में कहा गया है कि यह भौतिक जगत आध्यात्मिक जगत का एक चौथाई भाग है इसका अर्थ है कि आध्यात्मिक जगत भौतिक जगत से ज्यादा विस्तारित है और इसलिए भौतिक जगत से ज्यादा जिम्मेदारी आध्यात्मिक जगत की है और वह जिम्मेदारी श्रीमती राधारानी अपने ऊपर लेती है।
श्रीमती राधारानी केवल और केवल भगवान् श्री कृष्ण की सेवा में रहती है और उनका कोई अन्य कार्य नहीं है, और जो कुछ भी भक्ति हम श्री कृष्ण के लिए कर पा रहें है वह केवल और केवल एकमात्र राधारानी की क़ृपा है।
वैसे भगवान् करोडो कामदेवों को मात देते हैं पर श्रीमती राधारानी अपनी मधुर मुस्कान से उनको मात दे देती हैं।
श्रीमती राधारानी कोई और नहीं अपितु भगवान् की ही शक्ति स्वरूपा है और वे महाराज वृषभान और माता कृतिदा की पुत्री रूप में रावल में उन्हें प्राप्त हुई। स्वर्णकांति उनका रूप सबको मोहित करता और उनके अंदर विनयशीलता, सौम्यता, लज्जा, मृदभाषी और ऐसे अनेक गुण जो सभी को प्रिय लगते।
आज वरसाना धाम जो वृषभानुजी का स्थल है और समस्त वैष्णव समुदाय पुरे विश्व में सम्पूर्ण रूप से राधारानी के प्राकट्य दिवस श्री श्री राधाष्टमी को पुरे ह्रदय में प्रेम के सागर उमड़ कर मना रहा है।
हम भगवान् श्री कृष्ण का जन्मोत्सव मनाते हैं पर जब तक हम श्रीमती राधारानी की कृपा उनके जन्मोत्सव अर्थात राधाष्टमी के रूप में नहीं मनाते कृष्ण हमें एक भक्त के रूप में कदापि स्वीकार नहीं करते हैं , क्योंकि एक माता के रूप में श्रीमती राधारानी हम पर कृपा करती है तभी कृष्ण हमें स्वीकार करते हैं।
जैसे बिना गुरु के हम भगवान् तक नहीं पहुँच सकते ठीक उसी प्रकार बिना श्रीमती राधारानी के भगवान् का प्रेम हमें प्राप्त नहीं हो सकता यही भक्ति का नियम है।
शास्त्रों में कहा गया है कि बिना राधारानी की अनुमति से कोई व्रजधाम में प्रवेश नहीं कर सकता और कृष्ण प्रेम को प्राप्त करना तो कोसो दूर है, इसलिए आइये हम सभी वृषभानु दुलारी से प्रार्थना करें की हमें श्री कृष्ण प्रेम और उनकी छाया में सदैव रखें।
राधाष्टमी महामहोत्सव की जय।
जय जय श्री राधे।
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