हमारी भौतिक प्रगति मात्र एक छलावा है , आज संसार का हर व्यक्ति अपने आपको शक्तिशाली, सुंदर, धनवान और वैभवशाली बनाने में जुटा है। पर हम वास्तव में अपने आपको कितना भी शक्तिशाली बना ले भगवान् के सामने हमारी शक्ति नगण्य है।
श्रीमद भागवतम के तीसरे स्कन्द के सत्रहवें अध्याय में दिति के दो महान शक्तिशाली असुर पुत्र हिरण्यकश्यपु और हिरण्याक्ष का वर्णन आता है कि इन दोनों असुरों का शरीर इस्पात की तरह मजबूत, पहाड़ की तरह ऊंचा और जब वे खड़े होते तो ऐसा प्रतीत होता कि सूर्य उनकी कमर से ढक गया है। जब हिरण्याक्ष चलता तब पृथ्वी में कम्पन्न होता और उसके बलिष्ठ भुजााओं के सामने स्वर्ग के देवराज इंद्र भी भयभीत होकर छुप जाते।
पर इन दोनों के आतंक से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में हाहकार मचा हुआ था और सभी देवतागण अत्यंत दुखी थे और उनके निवारण के लिए ब्रह्माजी के पास गए, ब्रह्माजी उन्हें सांत्वना देते है कि चिंता की कोई आवश्यकता नहीं भगवान् अपने वाराह और नरसिम्ह रूप में इन दोनों महान दैत्यों का वध करेंगे और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में शांति की व्यवस्था करेंगे।
ठीक इसी प्रकार आज के युग में भी कुछ हिरण्यकश्यपु और हिरण्याक्ष जैसे असुर अपने आप को अत्यंत शक्तिशाली समझते हैं और वे ईश्वरीय सत्ता को न मानने एवं शास्त्रों का खंडन करने और समाज में उत्पात मचाने का कार्य करते हैं पर शायद वे इस बात को भूल जाते हैं की जिन असुरों का भगवान् ने वध किया वो कोई साधारण असुर नहीं थे और उनकी तुलना में ये एक अंश मात्र भी नहीं है।
आसुरी सभ्यता भगवान् और उनके नियमों को स्वीकार न करने से प्रारम्भ होती है और जब यह सभ्यता अत्यधिक बढ़ जाती है तो समाज में अनियंत्रित यौन संबंध और उससे उतपन्न होने वाली आसुरी प्रवित्ति की संताने पुरे समाज को भ्रष्ट कर देती हैं।
एक अच्छी संतान उत्पत्ति के लिए हमें वैदिक नियमों का अपने जीवन में पालन करना अत्यंत ही आवश्यक है। जो अपने जीवन में सुख और शांति चाहते हैं कम से कम उन्हें धार्मिक प्रवित्ति की संतान करनी चाहिए अन्यथा ऐसे आसुरी संतान न तो समाज का, न देश का और न ही अपना कल्याण करेंगे।
हरे कृष्ण !

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