पितृ पक्ष को लेकर बहुत सारी भ्रांतिया लोंगो में पायी जाती है, कई बार लोग इस बात को लेकर भयभीत हो जाते हैं तो कई बार लोग इसे अनदेखा कर देते हैं की यह मात्र अन्धविश्वास है और कुछ भी नहीं।
पर हमारा वैदिक् शास्त्र हर वस्तु को प्रमाणिकता के साथ सत्यापित करता है कोई भावुकता से नहीं। पितृ पक्ष में श्राद्ध करना अर्थात पितरों को भोजन प्रदान करना जो की भगवान् विष्णु के यज्ञ के माध्यम द्वारा संपन्न किया जाता है और यह केवल वर्ष में एक बार ही किया जा सकता है।
श्राद्ध वेदों के अनुयायियों द्वारा मनाया जाने वाला एक कर्मकांड है। यह पन्द्रह दिनों का एक वार्षिक अवसर होता है जब कर्मकांड के द्वारा दिवंगत आत्माओं को आहुति देने के सिद्धांत का पालन किया जाता हैं।
इस प्रकार वे अपने पूर्वज, जिनके पास अभी भौतिक भोग के लिए स्थूल शरीर नहीं मिला है और वे पितृलोक में है , वे अपने वंशजों द्वारा श्राद्ध की क्रिया से फिर से नया शरीर प्राप्त कर सकते हैं।
श्राद्ध भारत में अभी भी मौजूद है, विशेष रूप से गया में, जहां एक प्रसिद्ध मंदिर जहाँ भगवान् विष्णु के चरण कमलों में आहुति दी जाती है। क्योंकि भगवान इस प्रकार वंशजों की भक्ति सेवा से प्रसन्न होते हैं, उनकी कृपा से वे उन पूर्वजों की आत्माओं को मुक्त करते हैं जिनके पास स्थूल शरीर नहीं है, और वे आध्यात्मिक उन्नति के विकास के लिए उन्हें फिर से एक स्थूल शरीर प्राप्त करने की कृपा करते हैं।
पर दुर्भाग्य से, माया के प्रभाव से, बद्ध आत्मा फिर से अपने नए शरीर को प्राप्त करके पुनः इन्द्रियतृप्ति के लिए फिर से लग जाता है , यह भूलकर कि इस तरह के कार्य से वह पुनः पितृ लोक को जा सकता है।
भगवान के भक्त, जो कृष्ण भावनामृत में हैं उन्हें श्राद्ध जैसे कर्मकांडों को करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि वह हमेशा भगवान को प्रसन्न करते हैं; इसलिए उसके पिता और पूर्वज जो शायद कठिनाई में थे, स्वतः ही मुक्त हो जाते हैं।
इसके ज्वलंत उदाहरण प्रह्लाद महाराज हैं। प्रह्लाद महाराज ने भगवान नृसिंहदेव से अपने दुष्ट पिता का उद्धार करने का अनुरोध किया, जिन्होंने कई बार भगवान के प्रति अपराध किया था। नरसिम्हा भगवान ने कहा कि जिस परिवार में प्रह्लाद जैसा वैष्णव पैदा होता है, न केवल उसके पिता बल्कि उसके पिता के पिता और उनके चौदह पीढ़ी तक - सभी स्वतः ही मुक्त हो जाते हैं ।
इसलिए, यदि कोई भगवान् श्री कृष्ण की भक्ति करता है तो उसके पूर्वजो को स्वयं भगवान् उद्धार कर देते हैं पर यदि हम भगवान् श्री कृष्ण की भक्ति में नहीं है तो हर एक पुत्र का कर्त्वय है की अपने पूर्वजो को तर्पण प्रदान करे अन्यथा उन्हें घोर संकटों का सामना करना पड़ सकता है।
यही एकमात्र कारण है कि हमारे समाज में पुत्र की प्राप्ति अनिवार्य मानी गयी है जो आगे चलकर अपने पिता के कर्मो से मुक्त कर उन्हें भगवद्धाम पहुचायेगा। यदि पुत्र अपने इस कार्य को संपन्न नहीं करता तो उसे इस भौतिक जगत के साथ-साथ मृत्य के पश्चात भी दंड भुगतना होगा।
हरे कृष्ण !

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