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अनुलोम और विलोम विवाह क्या है ?

हमारे वैदिक ग्रंथो में हर वस्तु को बड़ी ही स्पष्टता के साथ बताया गया है, यदि हम गहराई से इन शास्त्रों को देखते हैं तो हम संसार की हर वस्तुओं को ठीक - ठीक समझ पाने में सक्षम होंगे। 

श्रीमद भागवतम के तीसरे स्कन्द के २२वे अध्याय में स्वम्भू मनु और कर्दम मुनि के संवाद का बहुत ही सुंदर वर्णन मिलता है,  कैसे स्वम्भू मनु अपनी पुत्री देवहुति के विवाह का प्रस्ताव लेकर कर्दम मुनि के पास जाते हैं। 

कर्दम मुनि हजारों वर्षों की तपस्या से जिन्होंने भगवान् श्री विष्णु का दर्शन किया निराहार होने के कारण उनका शरीर जीर्ण लग रहा था वस्त्र गंदे हो चुके थे परन्तु उनका तेज उगते सूर्य की भांति चमक रहा था। 

कर्दम मुनि के पास न तो कोई धन था, न ही कोई महल पर उसके बावजूद भी विश्व के चक्रवर्ती सम्राट स्वम्भू मनु अपने पुत्री के लिए उन्हें चुन रहे थे क्योंकि वे जानते हैं की उनकी पुत्री के लिए कोई धनवान, ऐश्वर्यवान पति नहीं अपितु सामान गुण वाले चरित्रवान, ज्ञानवान, तपस्वी भगवान् का भक्त चाहिए जो गृहस्थ में रहकर भी घर को आश्रम जैसा पवित्र बनाये। 

जैसा की आज के समाज में बिल्कुल इसके विपरीत दर्शन हमें देखने को मिलता है, एक पिता अपनी पुत्री के लिए उसके समान गुण वाला पति न तलाशकर वह धन और ऐश्वर्य के पीछे भागता है जिससे वह पति के रूप गृहमेधि बन जाता है और जीवन नारकीय हो जाता है। 

यदपि स्वम्भू मनु क्षत्रिय हैं और कर्दम मुनि ब्राह्मण है पर शास्त्रों में ऐसा विवाह को अनुमति प्राप्त है एक उच्च कुल का वर अपने से निम्न कुल की कन्या का वरण कर सकता है इसे अनुलोम विवाह कहते हैं और इससे अच्छी संतान की उत्पत्ति होती है। 

यदि वर निम्न कुल का है और अपने से उच्च कुल की कन्या का वरण करता है तो  इसे विलोम विवाह कहते हैं और इससे अच्छी संतान की उत्पत्ति नहीं हो सकती है। 

एक पिता की यह सबसे बड़ी जिम्मेदारी है कि वह अपने पुत्री के लिए चरित्रवान, गुणवान, धार्मिक प्रवित्ति का वर चुने आज के तथाकथित किसी को भी जो धन लोलुप हैं न चुन ले। 


हरे कृष्ण !

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