Skip to main content

जिनकी माया सबको बांधती है उनको मैया ने बाँधा

श्री श्री राधा दामोदर लीला भगवान् की एक ऐसी लीला है जो बड़े-बड़े देवतााओं, ऋषियो-मुनियों को भी चकित करने वाली है तो हम जैसे साधारण जीवों की बात ही क्या है ?

भगवान् भगवद गीता के चतुर्थ अध्याय के ९ वे श्लोक में कहते हैं, हे अर्जुन जो मेरे जन्म और कर्म की दिव्यता को जान लेता है वह अंत समय में मेरे सनातन धाम को प्राप्त होता है। 

यहाँ पर भगवान् को यह कहने की आवश्यकता क्यों पड़ी ? क्योंकि वे जानते हैं कि संसार में ऐसे बहुत से लोग हैं जो भगवान् की दिव्यता को स्वीकार न करके उनको एक साधारण मनुष्य मानते हैं। 

कहते हैं अर्जुन को जब भगवान् श्री कृष्ण ने अपना विराट रूप दिखाया तब अर्जुन ने भगवान् को सखा के रूप में नहीं अपितु भगवान् जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के रचयिता हैं के रूप में स्वीकार किया। 

इस दामोदर ऊखल बंधन लीला से जो माता यशोदा के भय से कृष्ण भाग रहें हैं और उनके आंखे लाल हो गयी हैं ऐसे प्रतीत हो सकता हैं कि यदि वे भगवान् हैं तो एक छड़ी से कैसे डर सकते हैं ?

काल जिनसे भयभीत होता है वैसे भगवान् श्री कृष्ण मैया यशोदा के प्रेम भक्ति के कारण वात्सल्य भाव से अपने आपको भक्त के अधीन कर देते हैं, वहां वे अपनी भगवत्ता नहीं प्रदर्शित करते। 

 जैसे कोई पिता किसी बड़े कम्पनी का मालिक हो पर जब उसका बेटा उससे मिलने जाय तो वह अपना पद भूलकर उसे गोद में लेकर खलने लगता है , भले ही वह बड़े ऊचे पर ही क्यों न हो। 

ठीक उसी प्रकार भगवान श्री कृष्ण भक्तों के आधीन हो जाते हैं जब कोई प्रेमपूर्वक उनकी सेवा करने लगता हैं। 

आचार्यों ने भगवान् कृष्ण को जानने की जो सबसे उत्तम विधि बताई है वह है श्रवणम अर्थात किसी प्रामाणिक गुरु द्वारा श्री कृष्ण के बारे में सुन् ना , जब कोई भगवान के बारे में श्रवण करता हैं तब भगवान् उस व्यक्ति के हृदय में उपस्थित परमात्मा रूप में उसकी भक्ति को जागृत करते हैं जिससे वह इस संसार के बंधन में रहकर भी मुक्त हो जाता है। 

इस संसार में ऐसा कोई नहीं है जो स्वयं बंधा हो पर दूसरों को मुक्ति दिला दे, पर भगवान् स्वयं ऊखल में बंधे होने के पश्चात भी कुबेर के पुत्रों नलकुबेर और मणिग्रीव को बंधन से मुक्त किया। इस महान कार्य को केवल भगवान् श्री कृष्ण कर सकते हैं, तब क्यों न हम उनकी शरण ग्रहण करके अपने जीवन के दुखो से छुटकारा पाएं। 


हरे कृष्ण !

जय श्री राधा दामोदर !

Comments

Popular posts from this blog

दिवाली की हार्दिक शुभकामनाएँ

हमारा देश भारत सांस्कृतिक पर्वों का देश मना जाता है।  यहाँ पर न केवल विविध प्रकार के पर्व मनाये जाते है बल्कि उन पर्वों के पीछे कुछ न कुछ सामाजिक , पारम्परिक, सांसारिक, ऐतिहासिक और आध्यात्मिक कारण भी हैं।  पर आज शायद हम उन्हें जाने सुने बिना बस केवल एक प्रकार से अपनी इन्द्रियतृप्ति के लिए सभी त्योहारों को मना रहे हैं , जो न केवल समाज को गुमराह कर रहा हैं अपितु हमारी अपनी आस्था को भी ठेस पहुंचाता है।  बिना प्रमाणिकता के बस अपनी सनक वश किसी कार्य को करना यह केवल एक रजोगुण का प्रभाव है, और इस कारन व्यक्ति अपनी संस्कृति, धर्म और आस्था को एक तरफ रखकर केवल दिखावेबाजी में त्योहारों को मना रहा है।  आइये हम सभी दिवाली पर्व के इन सभी पहलुओं पर एक छोटी सी झलक डालते हैं जिससे हमने पता चले कि आखिर हम यह त्यौहार मनाते क्यों हैं ? पारम्परिक कारण : चूँकि हम सभी भारत भूमि में जन्म प्राप्त किये है इसलिए हमारा यह परम सौभाग्य है कि हमें बचपन से परम्परागत तरीके से इन सभी त्योहारों की छवि बचपन से मिलती आ रही हैं।  सामाजिक कारण : हमारी देश की बहुत ही अच्छी बात जो विविधता में एकता देखन...

भक्त वत्सल भगवान का अद्भुत रूप

भगवान् अपने भक्तों की रक्षा करने किसी भी रूप में आ सकते हैं फिर चाहे वे मनुष्य रूप में श्री राम के रूप, साक्षात् अपने मूल स्वरुप भगवान् श्री कृष्ण के रूप में अथवा अपने अद्भुत अवतार आधे शेर और आधे मनुष्य (नरसिंह ) के रूप में इससे वे बाध्य नहीं है।  भगवान् भगवद गीता के ४थे अध्याय के ९वें श्लोक में अर्जुन को  बताते हैं, कि हे अर्जुन जो मेरे जन्म और कर्म को दिव्य मानता हैं वह फिर इस दुखालय जगत में फिर से नहीं आता।  भगवान् भौतिक संसार के जीवों के जैसे बाध्य नहीं की किसी माता के गर्भ से ही जन्म ले, इसी बात को सत्य करने और हिरण्यकश्यपु जैसे महान राक्षस के भय से और अपने प्रिय भक्त प्रह्लाद की रक्षा करने भगवान् नरसिंह खम्भे से प्रकट हुए।  हिरण्यकशिपु को भगवान ब्रह्मा से विशेष वरदान प्राप्त था कि वह किसी मनुष्य, देवता, पशु या किसी अन्य प्राणी द्वारा नहीं मारा जा सकता था।  उसे न तो दिन में और न ही रात में किसी भी तरह के हथियार से मारा जा सकता था। तो, भगवान आधे मनुष्य, आधे शेर के रूप में प्रकट हुए और सभी शर्तों को पूरा करते हुए गोधूलि के समय हिरण्यकशिपु को अपने नाखूनों से म...

महाभारत का असली विलेन कौन?

वैसे भगवद गीता को हमारा पुरातन और सनातन वैदिक ग्रन्थ माना जाता है, जो भगवान् ने कुरुक्षेत्र में अर्जुन को सुनाई। भगवद गीता में मुख्य रूप से चार पात्र स्वयं भगवान् श्री कृष्ण, अर्जुन, संजय और धृतराष्ट है, पर प्रश्न यह उठता है कि गीता में इतने पात्र होते हुए भी गीता धृतराष्ट से ही क्यों शुरू हुई? वास्तव में यदि हम महाभारत की पृस्ठभूमि देखें तो हम समझ पाएंगे कि धृतराष्ट सक्रीय रूप से खलनायक नहीं है पर वे अपने ज्येष्ठ पुत्र दुर्योधन की आड़ में सम्पूर्ण संपत्ति को हड़पना चाहते थे।  धृतराष्ट का अर्थ ही धृत अर्थात धारण करना और राष्ट्र अर्थात सम्पूर्ण राज्य, जो सम्पूर्ण राज्य को अकेले ही धारण करना चाहता है और वह किसी भी प्रकार से फिर चाहे पांडवों को जहर देकर मारने की योजना बनाकर, लाख्यागृह में आग लगाकर या छल द्वारा जुएं में हराकर भरी सभा में द्रौपदी को निर्वस्त्र करना। वास्तव में दुर्योधन जन्म से ही आसुरी स्वाभाव वाला था, इसीलिए धृतराष्ट के छोटे भाई महाराज विदुर धृतराष्ट को जाकर कहते हैं कि यह पुत्र बड़े ही अपशगुन के साथ जन्म लिया है और इसके लक्षण सम्पूर्ण कौरवों के विनाश को सूचित करता है, बे...