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भीष्म पंचक व्रत - श्रील भीष्म देव स्तुति

चातुर्मास जो भक्ति के लिए बहुत ही अनुकूल माना जाता है और ऐसा सभी ग्रंथों में इसका प्रमाण मिलता है की यदि व्यक्ति चातुर्मास का थोड़ा भी नियम पालन करके भक्ति में दृढ़ता से आगे बढ़ता है तो निश्चित रूप से उसकी प्रगति होती है। 

पर यदि कोई चातुर्मास व्रत का पालन कर पाने में असमर्थ है तो उसके लिए कार्तिक मास जो सभी महीनो में (चातुर्मास का अंतिम महीना ) सबसे दिव्य माना जाता है और पद्म पुराण में श्री नारद मुनि और सत्यव्रत मुनि के संवाद से इसकी दिव्यता का पता चलता है कि किस प्रकार यदि व्यक्ति इस पवित्र महीने में श्री यशोदा दामोदर को दीप - दान करने से उसके सभी पापों का नाश हो जाता है और अंततोगत्वा भगवान् के धाम को प्रवेश मिलता है। 

उसमें भी यदि कोई आलस्य करता है और कार्तिक व्रत का पूर्ण रूप से पालन नहीं करता तो उसके लिए भीष्म पंचक व्रत का एक विशेष अवसर दिया जाता है, और यदि कोई आखिरी के केवल ५ दिनों का भी व्रत पालन कर लेता है तो उसे सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है और अंत में भगवद प्राप्ति होती है। 

श्रीमद भागवतम में प्रथम स्कन्द के ९वें अध्याय के ३२वें श्लोक से ४४वें श्लोक तक श्रील भीष्मदेव की स्तुति का वर्णन आता है जो बाणों की शैया पर लेटे हुए हैं और भगवान् श्री कृष्ण से प्रार्थना करते हैं की, हे प्रभु अब मैं इस भौतिक शरीर का त्याग करने वाला हूँ और मैं चाहता हूँ की इस शरीर को छोड़ने के पश्चात मुझे आपके चरणों की शरण मिले। 

श्रीभीष्म उवाच

इति मतिरुपकल्पिता वितृष्णा

भगवति सात्वतपुङ्गवे विभूम्नि ।

स्वसुखमुपगते क्‍वचिद्विहर्तुं

प्रकृतिमुपेयुषि यद्भ‍वप्रवाह: ॥ 1.9.32॥

श्रील भीष्मदेव भगवान् के एक महान भक्त एवं १२ महाजनों में से एक हैं जिनका सभी प्रकार से हम अनुशरण कर सकते हैं और उनकी प्रार्थना से हम सीख सकते हैं की किस प्रकार से एक भक्त को अंत समय में सभी अन्य आसक्तियों को छोड़कर केवल भगवान्  श्री कृष्ण का चिंतन करना चाहिए। 

कार्तिक मास एक भक्ति भरा महीना है और उसमें भी सर्वोत्तम भीष्म पंचक अंतिम पांच दिन जो एक दृढ संकल्पित होकर करता है, निश्चित रूप से उसके सारे भौतिक कष्ट नष्ट हो जाते है। 



जय श्री राधा दामोदर !

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