श्रील प्रभुपाद आज से लगभग ५० वर्ष पूर्व जब पाश्चात्य जगत में गए और वहां लोंगो को वैष्णव धर्म की शिक्षा का पाठ पढ़ा रहे थे तभी बहुत सारे लोंगो ने उनसे प्रश्न किया, आप ने भगवद गीता को ही अपने प्रचार का आधार क्यों चुना?
श्रील प्रभुपाद ने बताया श्रीमद भगवद गीता एक ऐसा दिव्य ग्रन्थ है जो चार वेदों, १८ पुराणों, १०८ उपनिषदों तथा दो महान ऐतिहासिक ग्रंथों रामायण एवं महाभारत का सार रूप है जो आज के युग के लिए अत्यंत प्रभावशाली है।
श्रीमद भागवतम में वर्णन आता है की कलियुग में लोगों की बुद्धि मंद, अभागे तथा कलुषित रहने वाले रहेंगे जिन्हे न तो इतनी बुद्धि होगी जो इतने सारे वैदिक ग्रंथो को समझ पाएं और न ही उनके पास इतना पर्याप्त समय होगा, इसलिए एकमात्र श्रीमद भगवद गीता ही एक विकल्प बचता है जो मानव कल्याण के लिए सर्वोत्तम औषधि है।
श्रीमद भगवद गीता में मुख्यतः ५ विषय हैं ईश्वर (कृष्ण), जीव , प्रकृति , काल एवं कर्म। इनमें से ऊपर के चार विषय हमारे नियंत्रण के बाहर है केवल कर्म ही एक विषय है जिसका नियंत्रण केवल हमारे हाँथ में है।
मनुष्य अपने कर्मों द्वारा अपनी स्वंत्रता का उपयोग करके अपने मनुष्य जीवन को सार्थक बना सकता है अथवा निर्थक कर सकता है इतनी मात्रा में स्वंत्रता एक जीव को प्राप्त है।
ईश्वर: ईश्वर कौन है ? इस बात की सम्पूर्ण जानकारी हमें भगवद गीता से प्राप्त होती है। इसलिए श्री कृष्ण के लिए श्री भगवान् उवाच करके प्रयुक्त किया गया है। इसकी पुष्टि भगवद गीता के अध्याय १०.८ वे श्लोक में प्राप्त होता है।
जीव: जीव भगवान् श्री कृष्ण का शाश्वत अंश है इसकी पुष्टि भगवद गीता के अध्याय १५.७ वे श्लोक में प्राप्त होता है। एक अंश होने के नाते जीव का स्वाभाव है की पूर्ण की सेवा करे तभी वह सदैव प्रसन्न रह पाएगा।
प्रकृति: यह भौतिक प्रकृति भगवान् की बहिरंगा शक्ति है और जीव उस शक्ति के तीन गुणों के आधीन होकर कार्य करता है पर अज्ञानता के कारण उसे लगता है की सब कुछ वह स्वंत्रत रूप से कार्य कर रहा है। और यदि कोई भौतिक गुणों से पार पाना चाहता है तो उसे भगवान् श्री कृष्ण की शरण लेनी होगी जैसा की भगवद गीता के अध्याय ७.१४ वे श्लोक में प्राप्त होता है
काल: भगवान् श्री कृष्ण स्वयं काल रूप में आते हैं और अभक्तों का संहार एवं भक्तों का उद्धार करते हैं, जैसाकि श्रीमद भागवतम में वर्णन आता है की भगवान् के हाँथ में सुदर्शन चक्र भक्तों की रक्षा करता है और कौमुदी गदा दुष्टों का संहार करता है जिसका वर्णन भगवद गीता के अध्याय ११.३२ वे श्लोक में प्राप्त होता है।
कर्म: कर्म करने की अलप स्वंत्रता एक जीव को प्राप्त है पर उसे शास्त्रयुक्त कर्म करने चाहिए अपने मनमाने ढंग से नहीं जिसका वर्णन भगवद गीता के अध्याय ४ .१७ वे श्लोक में प्राप्त होता है। एक व्यक्ति को कर्म, अकर्म और विकर्म के बारे में पूरी तरह अवगत होना चाहिए।
इतनी सुंदर और सटीक जानकारी केवल हमें भगवद गीता ही दे सकती है, इसलिए आप सभी से अनुरोध है कि आगामी गीता जयंती ४ दिसम्बर तक आप सभी गीता वितरण दान में सहयोग करें जिससे हम जन - जन तक इसे पहुंचा सके और लोंगो का कल्याण हो सके। आपके एक भगवद गीता दान से एक परिवार, समाज एवं सम्पूर्ण देश का कल्याण हो सकता है।
किसी भी जानकारी के लिए कृपया हमें संपर्क करे 9892217508 वेद पुरुष दास।
हरे कृष्ण !

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