प्रायः ऐसा हम ऐसा लोगों से सुनते हैं कि अतिथि भगवान् का रूप होते हैं पर क्या हम सही मायने में इसका मतलब और ठीक प्रकार से इसे व्यव्हार में लाते है।
अतिथि का अर्थ होता है जो बिना किसी तिथि के आपके घर आये जिसकी कोई पूर्वनियोजित तिथि न हो और देव उन्हें इसलिए कहा जाता है क्योंकि अतिथि को भगवान् एक प्रतिनिधि के रूप में आपके घर भेजते हैं जो आपके व्यव्हार से भगवान् के प्रति प्रेम को अवगत कराता है।
ऐसे तो हमारे भारतीय परम्परा में अतिथियों का बड़े ही आदर के साथ सम्मान किया जाता था फिर चाहे वह अमीर हो या गरीब पर बदलते समय और भौतिक प्रगति के कारण लोंगो में संस्कार के प्रति कोई रुझान नहीं रह गया जिससे यह परम्परा धीरे- धीरे लुप्त होती जा रही है।
श्रीमद भागवतम में इसका प्रमाण मिलता है स्कन्द ४ अध्याय २२ श्लोक १०
अधना अपि ते धन्या: साधवो गृहमेधिन: ।
यद्गृहा ह्यर्हवर्याम्बुतृणभूमीश्वरावरा: ॥ ४. २२ १० ॥
एक व्यक्ति कितना सम्बृद्धिशाली है इसका पता उसके धन, ऐश्वर्य और सम्पत्ति एवं परिवार से नहीं अपितु वह किस प्रकार से अतिथि का सत्कार करता है उसपर निर्भर करता है।
जो व्यक्ति ऊँचे भवन और सम्प्पन्न परिवार में तो रहता है पर साधु संतों एवं अतिथियों का सत्कार नहीं करता वह घर सांप के बिल के समान होता है।
आज इस अतिथि के सम्मान में गिरावट के कारण लोगों के हृदय कठोर, ईर्ष्या, तनाव और अन्य कितने सारे वस्तुओं ने घर बना लिया है।
श्रील प्रभुपाद अतिथि के सम्मान में कुछ बाते कहते हैं जो हर व्यक्ति बड़ी आसानी से कर सकता है और एक अतिथि का सम्मान और साथ ही साथ भगवान् श्री कृष्ण का प्रेम भी प्राप्त कर सकता है।
१. अतिथि को देखते ही उसके स्वागत में खड़े होना।
२. अतिथि को अपने नाम से प्रेमपूर्वक परिचय करना और अपने से श्रेष्ठ को प्रणाम, दण्डवत करना
३. गुरु, आचार्य, शिक्षक, माता - पिता (अपने अथवा दूसरे) को उचित सम्मान के साथ पूजा इत्यादि करना
४. जल देकर उनको आसन पर बिठाना
५. स्नान इत्यादि के बाद भोजन कराना
६. आरामदायक बिस्तर पर विश्राम कराना
७. जागने के पश्चात उनसे आने का प्रयोजन पूछना
८. कुछ न कुछ विदा करते समय उपहार स्वरुप देना
यह हमारी वैदिक संस्कृति के तरीके से अतिथि सत्कार की कुछ विधियां है जिसे कोई भी व्यक्ति बड़ी आसानी से अपने जीवन में पालन कर सकता है, इसमें उसका फायदा ही है।
पर आजकल बिलकुल उल्टा दर्शन प्राप्त होता है कुछ लोग अतिथि आने पर अप्रसन्न हो जाते हैं और चाय या काफी और बाजारू समोसे से उनका आवभगत करर्ते हैं जो एक प्रकार से हमारी सभ्यता ही नहीं है।
अतिथि को कम से कम इतना तो नहीं लगना चाहिए कि हमारे यहाँ आने से इस घर के लोग अप्रसन्न हैं, नहीं कुछ तो कम से कम प्रेमपूर्वक उन्हें जल और मीठी वाणी से भी हम उनका स्वागत कर सकते हैं।
आप सभी अपनी राय कमेंट में लिख सकते हैं।

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