भगवद गीता की शुरुआत से ही जब धृतराष्ट्र संजय से पूछ रहे थे कि युद्ध के मैदान में इकट्ठा होने के दौरान उनके पुत्र और पांडव क्या कर रहे हैं। यह बहुत स्पष्ट था कि धृतराष्ट्र अपने पुत्र दुर्योधन को कुरु वंश का राजा बनाना चाहते थे और पांडवों को राज्य से अलग करना चाहते थे।
हमारे वैदिक शास्त्र में कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति सही समय पर विवेकपूर्ण और ईमानदार से निर्णय नहीं लेता है तो उसे भविष्य में बहुत कष्ट अनावश्यक रूप से उठाने पड़ जाते है।
धृतराष्ट्र ने गलत समय पर और कपट की प्रवृत्ति के साथ गलत निर्णय लिया और इसीलिए उनके सभी पुत्र युद्ध के मैदान में मारे गए। यह स्वाभाविक है की कोई भी पिता अपने पुत्र के भले और अच्छे भविष्य का बारे में सोचता है पर इसका मतलब यह नहीं की पुत्र के अवगुणों को अनदेखा कर दिया जाये क्योंकि इस प्रकार से न तो पिता का ही न ही पुत्र का ही भला होता है।
युद्ध से पहले विदुर महाराज जैसे सभी बुद्धिमान व्यक्तित्व ने धृतराष्ट्र को सलाह दी कि वह दुर्योधन से अपना मोह त्याग दें और बुद्धि से निपटें और ईमानदारी से यह सोच विचार कर निर्णय ले कि उसे क्या करना है अथवा क्या नहीं करना है।
भगवद गीता हमें धृतराष्ट्र से यह शिक्षा देती है कि हमें क्या नहीं करना है और भगवान् श्री कृष्ण के सन्देश द्वारा यह शिक्षा मिलती है की हमें क्या करना है।
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