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जानिए कैसे पाँच महान पतिव्रता देवियों के नाम मात्र से पाप नष्ट हो जाते है ?

हमारे वैदिक शास्त्रों से ऐसे महान पतिव्रता स्त्रियों के चरित्र का वर्णन प्राप्त होता है जिससे न केवल हमारे समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं अपितु हमारा स्त्री जाति के प्रति सम्मान और अधिक बढ़ जाता है। 

चाणक्य पंडित के अनुसार केवल अपनी पत्नी को छोड़कर शेष सभी स्त्रियों को माता अथवा बहन का दर्जा देना चाहिए जिससे न केवल हमारे अंदर एक आदर्श चरित्र का निर्माण होता है बल्कि हम धर्म के प्रति और सत्यनिष्ठ हो जाते हैं। 

आज समाज में स्त्री -पुरुष का स्वछंद रूप से मेल - जोल न केवल सामाजिक वातावरण को ही दूषित नहीं कर रहा है अपितु स्त्रियों के प्रति काम वासना, भोग और ईर्ष्या को भी जन्म दे  रही है। 

आज की स्त्रियों वैदिक स्त्रियों के चरित्र का अनुशरण न करके फ़िल्मी हिरोईनों की नक़ल कर रही है , जिनका स्वयं कोई चरित्र नहीं है। 

हमारे वैदिक शास्त्रों से ऐसे पांच महान पतिव्रता स्त्रियों के चरित्र का वर्णन इस प्रकार प्राप्त होता है;

अहल्या द्रौपदी सीता तारा मंदोदरी तथा ।

पंचकन्याः स्मरेन्नित्यं महापातकनाशनम् ।।

अहिल्या, द्रौपदी, सीता, तारा और मंदोदरी - पाँच पुण्य देवियों का सदा ध्यान करने मात्र से हमारे सभी अत्याचार और पाप नष्ट हो जाते है। 

यह पांच देवियां कोई साधारण स्त्री नहीं है। 

माता अहिल्या एक राज कन्या थी और सब  त्याग कर उन्होंने गौतम ऋषि को अपना पति स्वीकार किया, यह कोई साधारण स्त्री कदापि स्वीकार नहीं कर सकती। 

माता द्रौपदी कोई साधारण कन्या नहीं थी, स्वयं उनके पिता द्रुपद महराज ने उन्हें यज्ञ से प्राप्त किया था, इसलिए वे यज्ञ कन्या थी।  

माता सीता स्वयं साक्षात् सौभाग्य की मूर्ति श्री लक्ष्मी देवी है, जिन्होंने अग्नि परीक्षा देकर अपनी पतिव्रता को सत्यापित किया। 

तारा जो कि एक वानर जाति एवं दुष्ट प्रकृति के व्यक्ति वालि की पत्नी थी पर उसने भी अपने पति के प्रति सदैव अपनी पतिव्रता धर्म का पालन किया। 

वैसे मंदोदरी एक कामी, क्रोधी, लोभी एवं दुष्ट प्रकृति वाले रावण की पत्नी थी पर रावण के इतने दुर्गुण को सहते हुए भी उन्होंने अपनी पतिव्रता धर्म का निष्ठापूर्वक पालन किया जिसका स्वयं भगवान् श्री राम एवं माता सीता बखान करते है। 

वास्तव में जो भी इन माताओं के प्रति सम्मान पूर्वक नित्य इनका नाम स्मरण कर लेता है तो वह सभी दोषो से मुक्त हो जाता है। 



हरे कृष्ण !

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