वैसे भगवद गीता को हमारा पुरातन और सनातन वैदिक ग्रन्थ माना जाता है, जो भगवान् ने कुरुक्षेत्र में अर्जुन को सुनाई। भगवद गीता में मुख्य रूप से चार पात्र स्वयं भगवान् श्री कृष्ण, अर्जुन, संजय और धृतराष्ट है, पर प्रश्न यह उठता है कि गीता में इतने पात्र होते हुए भी गीता धृतराष्ट से ही क्यों शुरू हुई?
वास्तव में यदि हम महाभारत की पृस्ठभूमि देखें तो हम समझ पाएंगे कि धृतराष्ट सक्रीय रूप से खलनायक नहीं है पर वे अपने ज्येष्ठ पुत्र दुर्योधन की आड़ में सम्पूर्ण संपत्ति को हड़पना चाहते थे।
धृतराष्ट का अर्थ ही धृत अर्थात धारण करना और राष्ट्र अर्थात सम्पूर्ण राज्य, जो सम्पूर्ण राज्य को अकेले ही धारण करना चाहता है और वह किसी भी प्रकार से फिर चाहे पांडवों को जहर देकर मारने की योजना बनाकर, लाख्यागृह में आग लगाकर या छल द्वारा जुएं में हराकर भरी सभा में द्रौपदी को निर्वस्त्र करना।
वास्तव में दुर्योधन जन्म से ही आसुरी स्वाभाव वाला था, इसीलिए धृतराष्ट के छोटे भाई महाराज विदुर धृतराष्ट को जाकर कहते हैं कि यह पुत्र बड़े ही अपशगुन के साथ जन्म लिया है और इसके लक्षण सम्पूर्ण कौरवों के विनाश को सूचित करता है, बेहतर यही होगा कि आप इसे त्याग दे।
पर विदुर की बातों को अनदेखा कर धृतराष्ट ने दुर्योधन को अपने घर में ही रखा। दुर्योधन के बड़े होने के साथ - साथ उसमें दुर्गुण भी बढ़ने लगे पर इन सभी के बावजूद भी धृतराष्ट्र दुर्योधन की सभी क्रिया कलापों को अनदेखा करते आ रहा था।
सबसे बड़ी धृष्ट्ता तो दुर्योधन ने तब कि जब वह अपने संत पुरुष चाचा विदुर को भरी सभा में रखैल पुत्र और राज्य के दुकड़ो पर पलने वाला कहकर सम्भोदित कर उनका अपमान किया, और यह सब धृतराष्ट के सामने घटित हुआ और धृतराष्ट्र बिलकुल चुप था।
शास्त्र ऐसा कहता है कि पाप करने वाले से ज्यादा पाप करते हुए देखकर मौन रहना दंड का ज्यादा अधिकारी होता है।
दुर्योधन के बार - बार जघन्य अपराधों को देखकर भी धृतराष्ट्र का चुप रहना इस बात की पुष्टि करता है कि वास्तव में धृतराष्ट्र स्वयं हर बात की सहमति करता था जिससे दुर्योधन ने अंततः युद्ध की स्थति पैदा कर दिया।
इसलिए महाभारत का असली विलेन कोई और नहीं स्वयं धृतराष्ट्र है।
हरे कृष्ण !

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