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भक्त वत्सल भगवान का अद्भुत रूप

भगवान् अपने भक्तों की रक्षा करने किसी भी रूप में आ सकते हैं फिर चाहे वे मनुष्य रूप में श्री राम के रूप, साक्षात् अपने मूल स्वरुप भगवान् श्री कृष्ण के रूप में अथवा अपने अद्भुत अवतार आधे शेर और आधे मनुष्य (नरसिंह ) के रूप में इससे वे बाध्य नहीं है। 

भगवान् भगवद गीता के ४थे अध्याय के ९वें श्लोक में अर्जुन को  बताते हैं, कि हे अर्जुन जो मेरे जन्म और कर्म को दिव्य मानता हैं वह फिर इस दुखालय जगत में फिर से नहीं आता। 

भगवान् भौतिक संसार के जीवों के जैसे बाध्य नहीं की किसी माता के गर्भ से ही जन्म ले, इसी बात को सत्य करने और हिरण्यकश्यपु जैसे महान राक्षस के भय से और अपने प्रिय भक्त प्रह्लाद की रक्षा करने भगवान् नरसिंह खम्भे से प्रकट हुए। 

हिरण्यकशिपु को भगवान ब्रह्मा से विशेष वरदान प्राप्त था कि वह किसी मनुष्य, देवता, पशु या किसी अन्य प्राणी द्वारा नहीं मारा जा सकता था। 

उसे न तो दिन में और न ही रात में किसी भी तरह के हथियार से मारा जा सकता था। तो, भगवान आधे मनुष्य, आधे शेर के रूप में प्रकट हुए और सभी शर्तों को पूरा करते हुए गोधूलि के समय हिरण्यकशिपु को अपने नाखूनों से मार डाला।

कभी - कभी इस संसार के आसुरी प्रवृत्ति के लोग भी अपने आपको अजर और अमर होने का वरदान चाहते हैं पर वे भूल जाते हैं कि भगवान् श्री कृष्ण की बनायीं प्रकृति के नियम को कोई भी तोड़ नहीं सकता है। 

इसलिए हर व्यक्ति को यह प्रयास करना चाहिए कि भगवान् द्वारा बनाये गए नियमों का पालन करते हुए ऐसे कार्य करे जिससे भगवान् प्रसन्न हो , और यदि हमारे कार्य से भगवान् प्रसन्न हो गएँ तो हमारा मनुष्य जीवन सार्थक हो जायेगा। 

भगवान् नरसिंह सभी भक्तों की रक्षा करते हैं उनका आविर्भाव दिवस आगामी दिनांक ४ मई २०२३ को है। अतः  भक्तों को चाहिए की महाराज प्रह्लाद और भगवान् नरसिंह की कथा को बार -बार श्रवण करे जिससे उन्हें भगवान् की कृपा प्राप्त हो और साथ ही साथ उनके स्तुति निम्न प्रार्थनाओं से करें, जयदेव गोस्वामी द्वारा भगवान नृसिंह की प्रार्थना - 

नमस्ते नरसिंहाय प्रह्लादाह्लाद-दायिने

हिरण्यकशिपोर्वक्षः- शिला-टङ्क-नखालये

मैं भगवान नरसिंह को प्रणाम करता हूँ जो प्रह्लाद महाराजा को आनंद देते हैं और जिनके नाखून

राक्षस हिरण्यकशिपु की पत्थर जैसी छाती पर छेनी की तरह हैं।

इतो नृसिंहः परतो नृसिंहो यतो यमी ततो नृसिंहः

बहिर नृसिंहो हृदये नृसिंहो नृसिंहम् आदिम शरणं प्रपद्ये

भगवान नृसिंह यहां भी हैं और वहां भी हैं। मैं जहां भी जाता हूं भगवान नृसिंह वहीं होते हैं। वह हृदय में भी है और बाहर

भी है। मैं भगवान नृसिंह, सभी चीजों की उत्पत्ति और सर्वोच्च शरण के लिए आत्मसमर्पण करता हूं। 

तव कर-कमल-वारे नखम अद्भुत-श्रृंगम

दलिता-हिरण्यकश्यप-तनु-भृंगम

केशव धृत-नरहरि-रूप जय जगदीश हरे

हे केशव! हे ब्रह्मांड के स्वामी! हे भगवान हरि, जिन्होंने आधे आदमी, आधे शेर का रूप धारण किया है!

आपकी जय हो ! जिस प्रकार कोई अपने नाखूनों के बीच एक ततैया को आसानी से कुचल सकता है, उसी तरह

आपके सुंदर

कमल के हाथों के अद्भुत नुकीले नाखूनों से हिरण्यकशिपु राक्षस का शरीर चीर-फाड़ कर दिया गया है।

जय नरसिंह देव नरसिंह देव

जय प्रह्लाद महराज जय प्रह्लाद महराज 

जय प्रभुपाद जय गुरुदेव 


भक्त वत्सल श्री नरसिंह भगवान् की जय। 

भक्त शिरोमणि श्रील प्रह्लाद महाराज की जय। 

जगत गुरु श्रील प्रभुपाद की जय। 





श्री नरसिंह चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनायें !

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