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प्रह्लाद महराज के दिव्य उपदेश

प्रह्लाद महराज दैत्यराज हिरण्यकशयपु के पुत्र होने के बावजूद भी साधु संग प्राप्त होने के नाते उन्हें दिव्य ज्ञान प्राप्त हुआ। 

जब प्रह्लाद महाराज अपनी माता कयाधु के गर्भ में थे तब देवर्षि श्री नारद मुनि ने उनको श्रीमद भागवतम का ज्ञान दिया, और ऐसे दिव्य ज्ञान को प्राप्त कर प्रह्लाद महराज जन्म से ही भगवान् श्री हरी विष्णु के भक्त बन गए , और अपने असुर मित्रों को भी शिक्षा दे रहे हैं कि आप सब भी भगवान् विष्णु की भक्ति करो जिससे आपको शाश्वत सुख प्राप्त हो। 

इन्द्रिय सुख के लिए इतना कठिन प्रयास करने की आवश्यकता नहीं है। आपके पास जो भी शरीर है, उसके अनुसार वह सुख बिना किसी प्रयास के आएगी। वह व्यवस्था पहले से ही प्रकृति द्वारा बनाई गई है और अपने आप आ जाएगी, जैसे कि दुख अपने आप आ जाता है वैसे ही आपके प्रारब्ध अनुसार आपका सुख भी आएगा। लेकिन जीवन में सबसे प्रिय चीज क्या है, इसकी समझ विकसित करने की जरूरत है।

हम में से प्रत्येक अपने सबसे प्रिय मित्र की तलाश कर रहा है। वह सबसे प्रिय मित्र सर्वोच्च भगवान, श्री कृष्ण हैं। वह हर किसी के दिल में हैं और वह हमें हमेशा के लिए हमें संतुष्ट करेंगे। हम केवल उनके नाम के जप  'हरे कृष्ण' द्वारा उन्हें प्रसन्न करके उनके साथ जुड़ सकते हैं और फिर वे हमारा सही मार्गदर्शन करेंगे। 

हम अधिक से अधिक 100 वर्ष तक जीवित रह सकते हैं। 20 साल खेलने - कूदने में बिना किसी आध्यात्मिक विकास के बर्बाद हो जाते हैं, फिर आगे के 40 साल स्त्री सुख में बीत जाते हैं।

इस प्रकार खेल में 20 साल, स्त्री सुख में 40 साल और फिर जीवन के अंत में, केवल २० साल मिलते हैं और उसमें हम परिवार जनो से आसक्त हो जाते  हैं और अंत में बिना भगवद प्राप्ति किये अपना शरीर त्याग देते  है और पशु के रूप में दूसरा शरीर धारण करते हैं ।

इस प्रकार हमने अपना मनुष्य जीवन व्यर्थ कर दिया, जो केवल एकमात्र भगवद प्राप्ति के लिए मिला था जो अन्य योनि में दुर्लभ है। 


जय नरसिंह देव, जय प्रह्लाद महराज !

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