श्रीमद भागवतम के ४थे स्कन्द के ८वें अध्याय में महाराज ध्रुव जब अपनी विमाता सुरुचि के अपमान जनक शब्दों को सुनकर सर्प की भांति फुफकारते हुए अपनी माँ सुनीति के पास जाकर सारा वृतांत सुनाते हैं।
तब माता सुनीति ध्रुव महाराज को सांत्वना देते हुए कहती है, हे पुत्र तुम्हारी माँ सुरुचि जो वचन तुम्हे कहे हैं भले ही वह क्रोध में कहे गए हो पर सत्य है, यदि तुम्हे अपनी पिता के गोद में बैठना है तो तुम्हे पूर्ण परुषोत्तम भगवान् विष्णु की ही शरण ग्रहण करनी चाहिए , वही एकमात्र व्यक्ति हैं जो तुम्हे वह पद प्रदान कर सकते हैं।
माता सुरुचि ने जो अपने सौतेले पुत्र ध्रुव महाराज के प्रति कड़वे बचन कहे थे वे सत्य थे, क्योंकि जब तक किसी पर भगवान की कृपा नहीं होती, तब तक उसे जीवन में कोई सफलता नहीं मिल सकती।
जीवन की सफलता का मापदंड इस जन्म के भौतिक सुख तथा अगले जन्म में मोक्ष प्राप्ति के द्वारा किया जा सकता है, और ऐसी सफलता परम भगवान् श्री कृष्ण की कृपा से ही संभव है। केवल मात्र कठिन परिश्रम से ही सफलता नहीं मिलती, हमारे परिश्रम के साथ - साथ भगवान् की कृपा भी बहुत आवश्यक है।
कोई कितना भी प्रयास क्यों न कर ले परन्तु जब तक भगवान की कृपा नहीं होगी कोई व्यक्ति सुखी तथा सफल नहीं हो सकता, और यदि किसी के ऊपर भगवान् की कृपा हो गयी तो वह व्यक्ति अन्य व्यक्तियों की अपेक्षा बड़ी ही आसानी से उस लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है जो दूसरों के लिए अत्यंत ही दुष्कर होता है।
ध्रुव महाराज ने भगवान् को प्रसन्न करके न केवल पृथ्वी पर ३६ हजार वर्षों तक सुखभोग किया अपितु भगवान की कृपा से उन्हें सुंदर ध्रुव लोक भी प्राप्त हुआ जिनका वर्णन आज सभी शास्त्र करते हैं।
दूसरा उदाहरण यदि हम देखें तो जिस संपत्ति के लिए असुरराज रावण ने घोर तपस्या की और शिवजी को प्रसन्न किया उसी संपत्ति को बिना किसी प्रयास के केवल मात्र भगवान् श्री राम के शरणागत होने से विभीषण ने प्राप्त कर ली।
जो संपति शिव रावनहि दीन्हि दिए दस माथ।
सोई संपदा विभीषनहि सकुचि दीन्हि रघुनाथ। ।
बुद्धिमान व्यक्ति वह नहीं जो घोर परिश्रम करके अपने जीवन को अस्थायी वस्तु को प्राप्त करने में लगा दे, अपितु बुद्धिमान वह है जो थोड़ा परिश्रम कर अपने आपको भगवान् के प्रति समर्पित करके अपने आप को भक्ति में लगाकर मनुष्य जीवन को सार्थक कर ले।
हरे कृष्ण !

Haribol, True indeed🙏
ReplyDeleteThank you Mataji!
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