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पांडवा निर्जला एकादशी महात्म्य

वैसे एकादशी को हम दो कारणों के द्वारा जान सकते हैं कि यह हमारे आध्यात्मिक एवं स्वास्थ्य दोनों दृष्टिकोण से कितना महत्वपूर्ण है। 

एकादशी का दूसरा अर्थ "हरिवास" या "माधव तिथि" के नाम से जाना जाता है, जिसका अर्थ है की कृष्ण के नजदीक होना और अपनी ११ इन्द्रियों (५ कर्म + ५ ज्ञान + १ मन) को भगवान् की सेवा में लगाना।

एकादशी महीने में दो बार आती है और उस दिन हम अन्न का उपवास रखकर केवल थोड़े फल अथवा जल से अपने आप को तृप्त करते हैं। 

वैज्ञानिक कारणों को यदि देखा जाय तो महीने में २ बार हमारे शरीर को आराम देना चाहिए क्योंकि हमारे पाचन शक्ति अत्यधिक कमजोर पड जाती है और एक दिन यदि हम इसे आराम देते हैं तो पुनः वह ठीक - ठीक कार्य करना प्रारम्भ कर देती है। 

आध्यात्मिक कारण को देखें तो यदि हम जिस दिन उपवास रखते हैं उस दिन हमारी इन्द्रियाँ शिथिल पड़ जाती है और ज्यादा परेशान  नहीं करतीं, इस कारण से हम अपनी इन्द्रियों साथ ही साथ मन को बड़ी आसानी से नियंत्रण में ला सकते हैं। 

एकादशी तिथि के दिन ही भगवान् विष्णु की अंतरंग शक्ति "एकादशी" ने दैत्य मूरा का वध किया था, तब से उस तिथि का नाम एकादशी माना जाता है। 

और जो भी व्यक्ति श्रद्धा पूर्वक इस व्रत का नियम से पालन करता है निश्चित रूप से उसके सारे पूर्व पाप नष्ट हो जाते हैं और अंत में वह भगवान् श्री कृष्ण के धाम जाता है। 

पांडवा निर्जला एकादशी विशेषकर भीम के लिए श्रील व्यासदेव कहते हैं, कि हे भीमसेन यदि तुम केवल इस एकादशी का व्रत कर लेते हो तो तुम्हे सभी एकादशी का फल प्राप्त हो जायेगा। 

वास्तव में भीमसेन को वृकोदर कहा जाता है उनकी जठराग्नि बहुत अधिक है और वे भूख सहन नहीं कर सकते हैं, पर अपने पितामह व्यासदेव की सलाह से उन्होंने इस निर्जला एकादशी व्रत का पालन किया। 

आप सभी इस व्रत के पालन हेतु भगवान् श्री कृष्ण के नाम का जप, कीर्तन, श्रवण इत्यादि करके इसका पूरा लाभ उठा सकते हैं। 


हरे कृष्ण !

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